राजस्थान की राजनीति में हनुमान बनाम हरीश, यह टकराव अब निजी से बना सियासी

राजस्थान की राजनीति में इन दिनों एक बार फिर से चर्चा का सबसे गर्म विषय है—बाड़मेर के कद्दावर कांग्रेसी नेता हरीश चौधरी और नागौर के तेजतर्रार सांसद हनुमान बेनीवाल की बढ़ती हुई दुश्मनी।

राजस्थान की राजनीति में हनुमान बनाम हरीश, यह टकराव अब निजी से बना सियासी

राजस्थान की राजनीति में इन दिनों एक बार फिर से चर्चा का सबसे गर्म विषय है—बाड़मेर के कद्दावर कांग्रेसी नेता हरीश चौधरी और नागौर के तेजतर्रार सांसद हनुमान बेनीवाल की बढ़ती हुई दुश्मनी। दोनों ही जाट समुदाय से आते हैं और दोनों की राजनीतिक जड़ें मारवाड़ की धरती से जुड़ी हैं, लेकिन बीते कुछ वर्षों में इन दोनों के रिश्ते इतने तल्ख़ हो चुके हैं कि अब हर मंच, हर बयान में एक-दूसरे को निशाने पर लेने का कोई मौका नहीं छोड़ते।

ताज़ा विवाद तब शुरू हुआ जब कांग्रेस पार्टी ने आगामी बिहार विधानसभा चुनाव के लिए अपने पर्यवेक्षकों और जिला प्रभारियों की सूची जारी की। इस सूची में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को बिहार का वरिष्ठ पर्यवेक्षक बनाया गया है, जबकि हरीश चौधरी उसी टीम में जिला स्तर के प्रभारी के रूप में शामिल किए गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि हरीश चौधरी ने कुछ समय पहले ही मेवाराम जैन की कांग्रेस में वापसी को लेकर एक बयान में कहा था — “जरूरत पड़ी तो राजनीति छोड़ दूंगा लेकिन चरित्रहीन लोगों के साथ कोई समझौता नहीं होगा, यह बयान इनडायरेक्ट अशोक गहलोत पर हमला था। इसी बात को लेकर अब हनुमान बेनीवाल ने हरीश चौधरी को निशाने पर लेते हुए कहा कि “जो खुद को गहलोत से बड़ा समझता था, आज वही डायरी-पेन लेकर उन्हीं को रिपोर्ट देगा। क्या जमीर मर गया इनका?”

असल में, हनुमान बेनीवाल और हरीश चौधरी की दुश्मनी की जड़ें 2018 के विधानसभा चुनाव में बायतु विधानसभा सीट से शुरू होती हैं। उस समय हरीश चौधरी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में थे और हनुमान बेनीवाल की नवगठित पार्टी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) ने वहां से उमेदाराम बेनीवाल को उम्मीदवार बनाया था। उस चुनाव में उमेदाराम बेनीवाल ने इतना वोट काटा कि भाजपा तीसरे नंबर पर चली गई और हरीश चौधरी बड़ी मुश्किल से जीत पाए। यहीं से दोनों के रिश्तों में स्थायी दरार पड़ गई।

इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में हनुमान बेनीवाल एनडीए गठबंधन से नागौर से सांसद बने, जबकि बाड़मेर से भाजपा के कैलाश चौधरी विजयी हुए और केंद्र में मंत्री बने। इसी दौर में बायतु क्षेत्र से गुजरते हुए कैलाश चौधरी और हनुमान बेनीवाल के काफिले पर पथराव हुआ, जिसमें बेनीवाल ने खुलेआम हरीश चौधरी के समर्थकों पर आरोप लगाया। इसके बाद दोनों नेताओं के बीच मंचों से बयानबाजी खुलकर हुई और सियासी टकराव स्थायी रूप से स्थापित हो गया।

वहीं 2023 के विधानसभा चुनाव में भी यह टकराव अपने चरम पर था। हनुमान बेनीवाल की पार्टी ने एक बार फिर बायतु से उमेदाराम बेनीवाल को उतारा, लेकिन वह मात्र 1000 वोटों के मामूली अंतर से हरीश चौधरी से हार गए। इस हार का ठीकरा भी हनुमान ने हरीश चौधरी पर फोड़ा और चुनावी धांधली के आरोप लगाए। लेकिन राजनीति का पासा तब पलटा जब 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हरीश चौधरी ने उन्हीं उमेदाराम बेनीवाल को तोड़कर कांग्रेस में शामिल करा दिया और उन्हें बाड़मेर से टिकट दिला दिया। नतीजा यह हुआ कि उमेदाराम बेनीवाल अब कांग्रेस के सांसद बन चुके हैं, जबकि हनुमान बेनीवाल नागौर से सांसद बने।

इस हार-जीत के बीच खींवसर उपचुनाव एक नया अध्याय लेकर आया। नागौर से सांसद बनने के कारण हनुमान बेनीवाल की विधानसभा सीट खींवसर खाली हुई, जिस पर उन्होंने अपनी पत्नी कनिका बेनीवाल को उम्मीदवार बनाया। लेकिन इस उपचुनाव में कांग्रेस ने ऐसा उम्मीदवार उतारा जिसने भाजपा प्रत्याशी को लाभ पहुंचाया और कनिका बेनीवाल करीबी अंतर से हार गईं। हनुमान बेनीवाल ने इस हार के लिए खुलकर हरीश चौधरी और कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा को जिम्मेदार ठहराया, यह आरोप लगाते हुए कि दोनों ने भाजपा की मदद की थी ताकि RLP को हराया जा सके।

इन राजनीतिक घटनाओं के बीच, दोनों नेताओं की व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता अब मर्यादाओं से बाहर होती जा रही है। किसान आंदोलन, ओबीसी आरक्षण संशोधन और स्थानीय मुद्दों पर भी दोनों के बीच टकराव देखा गया है। पहले जहां हरीश चौधरी आक्रामक रुख में रहते थे, वहीं अब बेनीवाल की बढ़ती ताकत और खुद की कमजोर होती पकड़ के चलते वे ज्यादातर चुप्पी साधे रहते हैं।

दरअसल, कांग्रेस की आंतरिक राजनीति में हरीश चौधरी का प्रभाव अब उतना नहीं रहा। अशोक गहलोत की सक्रियता और लॉबी ने बाड़मेर की राजनीति में हरीश चौधरी के विरोधियों - पूर्व मंत्री अमीन खान और मेवाराम जैन की वापसी को भी संभव बनाया, जिसे हरीश की कमजोरी के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं, हनुमान बेनीवाल अपने हर भाषण में हरीश चौधरी पर व्यक्तिगत कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि “मैं अपने दुश्मनों को कभी नहीं भूलता, मौका मिला तो रगड़ दूंगा।”

आज स्थिति यह है कि मारवाड़ की राजनीति में हरीश चौधरी धीरे-धीरे संगठन के भीतर सीमित होते जा रहे हैं, जबकि हनुमान बेनीवाल जनआंदोलन और सियासी बयानबाजी से जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर चुके हैं। एक वक्त था जब हरीश चौधरी सत्ता और संगठन दोनों में प्रभाव रखते थे, लेकिन अब हनुमान बेनीवाल की हर गूंजती आवाज उन्हें असहज कर देती है।

कुल मिलाकर, यह दुश्मनी सिर्फ दो नेताओं के बीच का व्यक्तिगत झगड़ा नहीं है, बल्कि यह मारवाड़ के दो सियासी दिग्गजों की टक्कर है—जहां एक तरफ कांग्रेस की पुरानी ताकत है, तो दूसरी ओर किसान एवं युवा आंदोलनों से उभरी नई आवाज। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या हरीश चौधरी अपनी खोई साख वापस पा सकेंगे, या हनुमान बेनीवाल की राजनीतिक जमीं और भी मजबूत होती जाएगी।