बासनपीर प्रकरण में हाईकोर्ट का सख्त रुख: गिरफ्तारी की तस्वीरें साझा करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन
हाईकोर्ट के अनुसार, चाहे व्यक्ति विचाराधीन कैदी हो या दोषी, जेल में हो या पुलिस हिरासत में, उसका गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार (अनुच्छेद 21) बना रहता है
जैसलमेर जिले के बासनपीर जुनी गांव में पुरानी छतरियों के पुनर्निर्माण को लेकर हुए विवाद ने अब एक अहम संवैधानिक बहस का रूप ले लिया है। इस मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने न सिर्फ पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि गिरफ्तार लोगों की तस्वीरें सार्वजनिक करने की प्रवृत्ति को भी मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन बताया है।
क्या है पूरा मामला
10 जुलाई 2025 को बासनपीर गांव में पुरानी छतरियों के पुनर्निर्माण को लेकर तनाव बढ़ गया था। मौके पर पहुंची पुलिस के अनुसार हालात बिगड़ने पर उन पर जानलेवा हमला किया गया, सरकारी वाहनों के शीशे तोड़े गए और महिलाओं सहित भीड़ ने पथराव किया। इसके बाद पुलिस ने राजकार्य में बाधा डालने सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर कुल 23 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं। बाद में पुलिस ने कथित मुख्य साजिशकर्ता हासम खान को भी गिरफ्तार कर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया।

हाईकोर्ट में याचिका और गंभीर आरोप
घटनाक्रम के बाद इस्लाम खान, बाय खान, सुभान खान सहित 10 याचिकाकर्ताओं ने राजस्थान हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। याचिका में आरोप लगाया गया कि गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने पुरुषों और महिलाओं को थाने के गेट पर बैठाकर उनकी तस्वीरें खींचीं और उन्हें सोशल मीडिया व अखबारों में इस तरह प्रसारित किया गया, जैसे वे सिद्ध अपराधी हों। विशेष रूप से अविवाहित युवतियों और महिलाओं की तस्वीरें वायरल होने से उनके सामाजिक सम्मान और निजता को गंभीर क्षति पहुंची।

कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस फरजंद अली ने पुलिस की इस कार्रवाई को “संस्थागत अपमान” करार दिया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कोई भी व्यक्ति तब तक अपराधी नहीं होता, जब तक अदालत उसे दोषी घोषित न कर दे। गिरफ्तारी के बाद सार्वजनिक अपमान और तस्वीरें साझा करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और गरिमा के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
सुनवाई के दौरान जोधपुर के अधिवक्ता मोहन सिंह रतनू के मामले का भी उल्लेख हुआ, जहां इसी तरह गिरफ्तारी की तस्वीरें वायरल की गई थीं। कोर्ट ने इसे एक खतरनाक प्रवृत्ति बताते हुए चेताया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर मौलिक अधिकारों को कुचला नहीं जा सकता।
पुलिस को सख्त निर्देश
हाईकोर्ट ने जैसलमेर के पुलिस अधीक्षक (SP) को निर्देश दिए हैं कि बासनपीर प्रकरण में गिरफ्तार सभी लोगों की तस्वीरें 24 घंटे के भीतर सोशल मीडिया और वेब पोर्टलों से हटाई जाएं। साथ ही, SP को आरोपों पर विस्तृत जवाब हलफनामे के साथ प्रस्तुत करने के आदेश भी दिए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी 2026 को निर्धारित की गई है।
बड़ा सवाल
यह मामला केवल बासनपीर तक सीमित नहीं है, बल्कि पुलिसिंग के उस चलन पर सवाल खड़े करता है जिसमें गिरफ्तारी को ‘सार्वजनिक प्रदर्शन’ बना दिया जाता है। क्या कानून का पालन कराने वाली एजेंसियां खुद कानून और संविधान की मर्यादाओं का पालन कर रही हैं? हाईकोर्ट का यह आदेश आने वाले समय में पुलिस की कार्यशैली पर एक महत्वपूर्ण नजीर साबित हो सकता है।

