बाड़मेर की राजनीति: जब जातियां आमने-सामने और नेता एक मंच पर

बाड़मेर की राजनीति आज एक मोड़ पर खड़ी है। या तो हम जाति बनाम जाति की राजनीति में उलझे रहेंगे, या फिर यह समझेंगे कि नेता बदल सकते हैं, गठबंधन बदल सकते हैं — लेकिन समाज नहीं टूटना चाहिए

बाड़मेर की राजनीति: जब जातियां आमने-सामने और नेता एक मंच पर

बाड़मेर की राजनीति: जब जातियां आमने-सामने और नेता एक मंच पर

बाड़मेर, जिसे हमेशा से थार की अपणायत, सामाजिक सौहार्द और भाईचारे के लिए जाना जाता रहा है, आज उसी ज़मीन पर खड़े होकर खुद से सवाल कर रहा है। सवाल यह नहीं कि कौन सा नेता किसके साथ बैठा, सवाल यह है कि जिन नेताओं के नाम पर समाज आपस में बंटा, वे नेता आखिर एक ही मंच पर कैसे सहज दिखे?

हाल ही में बाड़मेर में आयोजित एक मीडिया अवॉर्ड शो के दौरान जब रविंद्र सिंह भाटी और हरीश चौधरी साथ बैठे और रिश्तों, संवाद और राजनीति पर अपनी-अपनी राय रखी, तो यह दृश्य अपने आप में चौंकाने वाला था। चौंकाने वाला इसलिए नहीं कि दो नेता साथ बैठे, बल्कि इसलिए कि इन्हीं दोनों के नाम पर पिछले कुछ वर्षों में जाट-राजपूत, और अब राजपूत-मुस्लिम के बीच तनाव की राजनीति देखी गई।

“जनता लड़े, नेता मिलें” — यही है असली राजनीति?

यह कोई नई बात नहीं है कि चुनावी दौर में जातीय ध्रुवीकरण एक आसान हथियार बन जाता है।

  • कभी जाट बनाम राजपूत

  • कभी राजपूत बनाम मुस्लिम

  • और कभी क्षेत्र बनाम क्षेत्र

लेकिन सवाल यह है कि इस लड़ाई में नुकसान किसका हुआ?
न नौजवानों को रोजगार मिला,
न क्षेत्र को विकास,
और न ही सामाजिक सौहार्द बचा।

आज बाड़मेर के गांव-कस्बों में अगर युवाओं के बीच तल्खी बढ़ी है, सोशल मीडिया पर गालियां और धमकियां आम हो गई हैं, तो उसकी जड़ें इसी राजनीतिक विभाजन में हैं।

और जब वही नेता, जिनके नाम पर यह विभाजन हुआ, एक मंच पर बैठकर सहज बातचीत करते दिखें — तो जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।

बाड़मेर की राजनीति में जाति: मजबूरी या रणनीति?

बाड़मेर की राजनीति ऐतिहासिक रूप से जातीय समीकरणों से प्रभावित रही है।
लेकिन पहले यह प्रतिनिधित्व की राजनीति थी,
अब यह विभाजन की राजनीति बनती जा रही है।

जाट और राजपूत दोनों ही इस क्षेत्र की रीढ़ रहे हैं —
चाहे वह सीमाओं की रक्षा हो,
या खेती-पशुपालन,
या फिर सामाजिक नेतृत्व।

इन दोनों समुदायों को आमने-सामने खड़ा करना किसी भी हाल में बाड़मेर के हित में नहीं रहा। इसके बावजूद, चुनाव आते ही वही पुराना फार्मूला अपनाया गया — भावनाएं भड़काओ, वोट बटोरों।

मीडिया अवॉर्ड शो: एक प्रतीकात्मक आईना

जिस मंच पर रविंद्र सिंह भाटी और हरीश चौधरी साथ बैठे, वह मंच अपने आप में एक आईना बन गया।
आईना इस बात का कि:

  • राजनीति में मतभेद स्थायी नहीं होते

  • रिश्ते टूटते नहीं, बस चुनाव तक टाले जाते हैं

  • और जनता की भावनाएं अक्सर रणनीति का साधन बन जाती हैं

यह दृश्य बताता है कि राजनीतिक असहमति निजी दुश्मनी नहीं होती, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि यही बात जनता को कभी ईमानदारी से नहीं समझाई गई।

युवाओं के लिए सबसे बड़ा खतरा

इस पूरी राजनीति का सबसे बड़ा नुकसान बाड़मेर के युवाओं को हो रहा है।
आज का युवा:

  • जाति के नाम पर गुस्से में है

  • सोशल मीडिया पर एक-दूसरे का दुश्मन बन रहा है

  • और असली मुद्दों — रोजगार, शिक्षा, पानी, स्वास्थ्य — से भटक रहा है

जब नेता मंच साझा कर सकते हैं,
तो युवा क्यों नहीं?

सावधान रहने की जरूरत क्यों है?

यह लेख किसी नेता के समर्थन या विरोध में नहीं है।
यह चेतावनी है — समाज के लिए।

  • नेताओं के भाषण स्थायी नहीं होते

  • राजनीतिक गठजोड़ बदलते रहते हैं

  • लेकिन समाज में पैदा हुई दरारें भरने में दशकों लग जाते हैं

इसलिए ज़रूरी है कि:

  • राजनीतिक मतभेद को सामाजिक दुश्मनी न बनने दिया जाए

  • जाति के नाम पर भड़काए जाने से पहले सवाल पूछे जाएं

  • और थार की अपणायत को किसी भी सियासी खेल का शिकार न बनने दिया जाए

नेता एक, जनता अलग?

बाड़मेर की राजनीति आज एक मोड़ पर खड़ी है।
या तो हम जाति बनाम जाति की राजनीति में उलझे रहेंगे,
या फिर यह समझेंगे कि नेता बदल सकते हैं, गठबंधन बदल सकते हैं — लेकिन समाज नहीं टूटना चाहिए।

शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश है —
जनता को लड़ाने वाली राजनीति से सावधान रहें, क्योंकि अंत में नेता साथ बैठ जाते हैं… और समाज अकेला रह जाता है।