बाड़मेर की रेत से उठी नई राजनीति, क्या खुद की पार्टी बनाएंगे भाटी ?
राजस्थान के बाड़मेर जिले की राजनीति में रविंद्र सिंह भाटी का नाम तेजी से उभर रहा है। 1997 में बाड़मेर के एक छोटे से गांव में जन्मे भाटी ने छात्र राजनीति से शुरुआत की। बाद में उन्होंने एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में 2023 में विधानसभा चुनाव जीता।
राजस्थान के बाड़मेर जिले की राजनीति में रविंद्र सिंह भाटी का नाम तेजी से उभर रहा है। 1997 में बाड़मेर के एक छोटे से गांव में जन्मे भाटी ने छात्र राजनीति से शुरुआत की। बाद में उन्होंने एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में 2023 में विधानसभा चुनाव जीता। भाजपा के अंदर रहकर उन्हें टिकट नहीं मिला, जिसके बाद उन्होंने अलग राह पर चलना चुना। बाड़मेर की राजनीति में पारंपरिक दलों-बीजेपी और कांग्रेस-का दबदबा है। लेकिन उनकी लोकप्रियता ने दिखा दिया कि जनता में नया विकल्प पनप रहा है। इस स्थिति में सवाल उठता है: क्या भाटी अपनी पार्टी बना सकते हैं? यदि हां, तो इसके राजनीतिक मास्टरचार्ट में कौन-कौन ओर क्या परिवर्तन होंगे?
पार्टी बनाने के फायदे
अगर भाटी ने अपनी पार्टी गठन का निर्णय लिया, तो सबसे स्पष्ट फायदा उनके लिए यह होगा कि वे अब किसी बड़े दल की छाया से नहीं बंधेंगे। आगामी चुनावों में वे सीधे अपने वोट बैंक, युवाओं, युवा किसानों तथा युवा मतदाताओं से संवाद कर सकते हैं। उनका व्यक्तित्व पार्टी से ऊपर हो जाएगा। इससे बाड़मेर-क्षेत्र की राजनीति में एक नया विकल्प सामने आएगा, जो पारंपरिक जाल को तोड़ने का संकेत देगा।

पार्टी चलाना आसान है क्या?
पार्टी बनाना आसान है पर टिकाना बेहद मुश्किल है। संगठन, पैसों, कार्यकर्ता-नेटवर्क और चुनाव-रणनीति की जितनी जरूरत है। उनमें कमी होगी तो पार्टी प्रारंभ ही संघर्ष से करेगी। इस तरह दक्षिण-पश्चिम राजस्थान के राजनीतिक समीकरण में बदलाव आ सकता है। भाटी की पार्टी भाजपा के वोट बैंक को काट सकती है, खासकर जाट-समुदाय, युवा मतदाताओं और ग्रामीण इलाकों में जहां बड़ी दलों ने अपेक्षित पकड़ नहीं बनाई है।
बीजेपी-कांग्रेस वोटबैंक में सैंध
बाड़मेर में भाजपा-कांग्रेस-स्थानीय नेताओं का लगातार घमासान चलता रहा है और पारंपरिक वोट बैंक टूटने लगे हैं। उदाहरण के लिए, 2024 लोकसभा चुनाव में बाड़मेर सीट पर भाजपा तीसरे स्थान पर रही और कांग्रेस ने जीत दर्ज की, जबकि भाटी ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में दूसरे स्थान से संकेत दिया कि व्यवस्था बदल सकती है। इससे यह दिखता है कि भाटी-सीमित संसाधनों के बावजूद-वोटर्स के बीच अहम विकल्प बने हैं। उनकी पार्टी बनने पर भाजपा को नुकसान होगा क्योंकि युवा मतदाताओं तथा जाट-वोट बैंक में विभाजन संभव है; कांग्रेस को सौदेबाजी और गठबंधन-स्थिति में लाभ मिल सकता है क्योंकि एक नए विकल्प के कारण भाजपा कमजोर पड़ सकती है।
बाड़मेर जैसे जिले में जहां पारंपरिक जातीय समीकरण, स्थानीय प्रभावशाली नेताओं की शक्ति और दल-मशीनरी का समांतर नेटवर्क है, किसी नए दल को अस्थिरता से लड़ना होगा। पार्टी के स्थाई संगठन के निर्माण, स्थानीय कार्यकर्ता-शक्ति जुटाने, निर्वाचन आयोग के नियम तथा चुनावी मैदान की चुनौतियों से पार पाना होगा। अगर भाटी अपनी पार्टी बनाते हैं लेकिन सिर्फ अपनी लोकप्रियता पर भरोसा करेंगे, संगठन-शून्य होकर वे जल्दी संघर्ष की स्थिति में आ सकते हैं। इसलिए उनकी रणनीति यह होनी चाहिए कि अपने खुद के पहचान-मंत्र को स्पष्ट करें-“नया विकल्प, युवा आवाज़, बाड़मेर का विकास”-और जल्दी से स्थानीय-ब्लॉक-मंडल स्तर पर कार्यकर्ता तैयार करें।
सब मिलाकर, बाड़मेर की राजनीति में भाटी की पार्टी का आगमन एक संभावित गेम-चेंजर हो सकता है-अगर वे समय रहते संगठन बनाएं, संसाधन जुटाएं और जनता-विश्वास को चुनावी प्रतिफल में बदलें। अन्यथा, यह केवल एक खाली सनसनी बनकर रह सकता है जो अगले चुनावों में गायब हो जाए। बाड़मेर की राजनीति-बोर्ड पर बदलाव की हवा चल रही है-अब यह देखने वाली बात होगी कि भाटी उस हवा का पंखा बना पाते हैं या उसका शिकार।

