गोपाल शर्मा और PCC अध्यक्ष डोटासरा के बीच ‘राम’ नाम पर सियासी जंग ,“एक करोड़ भी मंजूर, पर राम नहीं”
राजस्थान की राजनीति में “राम” नाम को लेकर बड़ा सियासी विवाद खड़ा हो गया है। सिविल लाइंस विधायक गोपाल शर्मा के “एक लाख की कोई कीमत नहीं” वाले बयान पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने पलटवार करते हुए कहा कि वे एक लाख नहीं, बल्कि एक करोड़ देने को तैयार हैं, लेकिन सरकारी बिल में “राम” नहीं लिखेंगे। यह विवाद आज के दौर में महंगाई, पैसे की गिरती कीमत और धार्मिक प्रतीकों की राजनीति को उजागर करता है।
“एक लाख की कोई कीमत नहीं” से “एक करोड़ भी मंजूर, पर राम नहीं”
सिविल लाइंस विधायक गोपाल शर्मा और PCC अध्यक्ष डोटासरा के बीच ‘राम’ नाम पर सियासी जंग

राजस्थान की राजनीति में इन दिनों बहस विकास, रोजगार या कानून-व्यवस्था पर नहीं, बल्कि “राम” नाम की कीमत पर छिड़ी हुई है। सिविल लाइंस से भाजपा विधायक गोपाल शर्मा और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के बीच जुबानी जंग अब लाखों–करोड़ों की शर्त तक पहुँच चुकी है। लेकिन यह विवाद सिर्फ धार्मिक शब्द का नहीं, बल्कि आज के दौर में पैसे की गिरती वैल्यू, महंगाई और राजनीति के बदलते प्रतीकों की भी कहानी है।
गोपाल शर्मा का दावा: “आज एक लाख रुपये की कोई कीमत नहीं”
भाजपा विधायक गोपाल शर्मा ने बयान देते हुए कहा कि—
“आज के समय में एक लाख रुपये की कोई खास कीमत ही नहीं रह गई है।”
यह बयान सुनने में भले सियासी तंज लगे, लेकिन अगर ज़मीनी हकीकत देखी जाए तो यह बात पूरी तरह गलत भी नहीं लगती।
आज एक लाख की असली कीमत क्या है?
कुछ साल पहले तक एक लाख रुपये—
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शादी में बड़ा खर्च माने जाते थे
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जमीन की बयाना रकम होती थी
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मध्यमवर्ग के लिए बड़ी बचत मानी जाती थी
लेकिन आज हालात बदले हुए हैं—
| खर्च | कीमत (लगभग) |
|---|---|
| 1 तोला सोना | ₹1,40,000 – ₹1,55,000 |
| 1 क्विंटल चांदी | ₹3,50,000 – ₹4,00,000 |
| 2 BHK फ्लैट (जयपुर) | ₹40–60 लाख |
| प्राइवेट स्कूल की सालाना फीस | ₹1–2 लाख |
| सामान्य अस्पताल इलाज | ₹50,000+ |
यानि आज एक लाख रुपये न तो सोना खरीद पाता है, न जमीन, न सुरक्षित भविष्य। महंगाई ने इसकी कीमत लगभग 10–15 गुना तक गिरा दी है।
लेकिन राजनीति में एक लाख से करोड़ तक कैसे पहुँची बात?

इसी बयान के जवाब में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने ऐसा पलटवार किया जिसने सियासी बहस को नई दिशा दे दी।
डोटासरा ने कहा—
“मैं एक लाख नहीं, एक करोड़ दे दूँगा…
आप इस बिल में ‘राम’ लिख दो।”
यहीं से मामला पैसे से ज़्यादा विचारधारा का बन गया।
“एक करोड़ भी मंजूर, लेकिन राम नहीं” — क्या संकेत देता है ये बयान?
डोटासरा के बयान का सीधा मतलब यही है कि—
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मुद्दा पैसे का नहीं है
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मुद्दा धार्मिक शब्दों के राजनीतिक इस्तेमाल का है
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मुद्दा यह है कि राज्य की नीतियों और कानूनों को धार्मिक पहचान से जोड़ा जाए या नहीं

सवाल उठता है: अगर राम नाम इतना ही मूल्यवान है तो करोड़ क्यों नहीं स्वीकार?
यह बहस अब सिर्फ शर्त की नहीं रही। यह सवाल बन चुकी है—
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अगर राम आस्था का विषय है, तो उसे शर्त में क्यों तौला जा रहा है?
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अगर एक करोड़ देने की बात हो रही है, तो क्या राजनीति में राम नाम का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीकात्मक है?
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क्या धार्मिक भावनाओं को आर्थिक सौदेबाज़ी में बदला जा रहा है?
महंगाई के दौर में राजनीति की नई मुद्रा: धार्मिक पहचान
आज जब—
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बेरोजगारी रिकॉर्ड स्तर पर है
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किसान कर्ज़ में डूबा है
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मध्यमवर्ग महंगाई से जूझ रहा है
तब राजनीति का केंद्र आर्थिक सवालों से हटकर पहचान और प्रतीकों पर आ गया है।
एक तरफ कहा जा रहा है—
“एक लाख की कोई कीमत नहीं”
दूसरी तरफ कहा जा रहा है—
“एक करोड़ दे दूँगा, पर राम बिल में करदो ”
इससे साफ है कि राजनीति में पैसे की कीमत घट रही है, लेकिन प्रतीकों की कीमत बढ़ती जा रही है।
जनता के मन में उठते सवाल
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क्या जनता के लिए भी एक लाख की कोई कीमत नहीं रही?
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क्या आम आदमी भी करोड़ की शर्त लगा सकता है?
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क्या महंगाई पर बहस से ध्यान हटाने के लिए ऐसे विवाद खड़े किए जा रहे हैं?
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क्या राम नाम अब आस्था से ज़्यादा राजनीतिक हथियार बन चुका है?
यह बहस सिर्फ दो नेताओं की नहीं
गोपाल शर्मा और गोविंद सिंह डोटासरा के बीच यह टकराव दरअसल—
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महंगाई बनाम राजनीति
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आस्था बनाम सत्ता
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पैसा बनाम प्रतीक
की लड़ाई है।
आज एक लाख की गिरती कीमत यह बताती है कि आम आदमी कितना कमजोर हो चुका है,
और एक करोड़ देने की राजनीतिक चुनौती यह दिखाती है कि राजनीति में अब मुद्दों से ज़्यादा प्रतीकों की लड़ाई है।
सवाल यह है—
क्या आने वाले चुनावों में भी जनता के असली मुद्दों की कीमत “एक लाख” से कम ही मानी जाएगी?
Hindu Solanki 
