‘हिंदू सम्मेलन’ के मंच से बढ़ती बयानबाज़ी पर सवाल, सामाजिक एकता और सरकारी मंशा को लेकर बहस तेज

हिंदू सम्मेलन के मंच से मीनाओं और SC-ST समुदाय को लेकर की गई बयानबाज़ी और UGC कानून को लेकर उठे सवालों ने सामाजिक एकता पर बहस छेड़ दी है। क्या सरकार की नीतियां समाज में विभाजन और असंतोष की चिंगारी डाल रही हैं? विस्तृत रिपोर्ट।

‘हिंदू सम्मेलन’ के मंच से बढ़ती बयानबाज़ी पर सवाल, सामाजिक एकता और सरकारी मंशा को लेकर बहस तेज

‘हिंदू सम्मेलन’ के मंच से बढ़ती बयानबाज़ी पर सवाल, सामाजिक एकता और सरकारी मंशा को लेकर बहस तेज


देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित हो रहे तथाकथित हिंदू सम्मेलनों के दौरान दिए जा रहे कुछ बयानों ने सामाजिक ताने-बाने को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इन आयोजनों में कथित तौर पर कुछ समुदायों, विशेषकर मीनाओं और एससी-एसटी वर्गों को लेकर की गई टिप्पणियों पर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में गहरी चिंता जताई जा रही है।

आलोचकों का कहना है कि इन मंचों से यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की जा रही है कि
“अगर वंचित वर्ग आगे बढ़े, तो वह दूसरों की आवाज़ दबा देगा”—
जो न सिर्फ़ संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है, बल्कि समाज में अविश्वास और भय का माहौल भी पैदा करता है।

बयानबाज़ी से बढ़ती सामाजिक खाई?

विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के वक्तव्य आरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे संवेदनशील विषयों को टकराव की भाषा में पेश करते हैं, जिससे जातीय और सामाजिक समूहों के बीच दूरी बढ़ सकती है।
संविधान समानता और अवसर की बात करता है, लेकिन मंचों से दिए जा रहे बयान एक वर्ग को दूसरे के खिलाफ खड़ा करने का आभास देते हैं।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि

“वंचित तबकों के सशक्तिकरण को ‘खतरे’ के रूप में पेश करना, दरअसल सामाजिक न्याय की अवधारणा को ही कटघरे में खड़ा करना है।”

UGC कानून और युवाओं में असंतोष का सवाल

इसी बीच, UGC से जुड़े नए कानून और शैक्षणिक नीतियों को लेकर भी सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं। छात्र संगठनों और शिक्षाविदों का एक वर्ग मानता है कि

  • शिक्षा का बढ़ता केंद्रीकरण

  • संस्थानों की स्वायत्तता पर असर

  • और असहमति की आवाज़ों पर सख़्ती

युवाओं में असंतोष को जन्म दे सकते हैं।

कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि सरकार कहीं अनजाने में समाज में ‘चिंगारी’ तो नहीं डाल रही, ताकि अलग-अलग पहचान और मुद्दों में उलझा युवा वर्ग एकजुट होकर सवाल न पूछ सके—जैसा हाल के वर्षों में कुछ पड़ोसी देशों में देखने को मिला।

“फूट बनाम एकता” की राजनीति?

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जब आर्थिक मुद्दे—
बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य—
जनता के बीच प्राथमिक चिंता बनते हैं, तब पहचान आधारित विमर्श को हवा देना सत्ता के लिए एक सुविधाजनक रणनीति बन सकता है।

हालांकि, सरकार समर्थक वर्ग इस आरोप को खारिज करते हुए कहता है कि
UGC कानून और ऐसे आयोजन “संस्कृति और व्यवस्था को मजबूत करने” के लिए हैं, न कि समाज को बांटने के लिए।

सवाल जो अब अनदेखे नहीं किए जा सकते

  • क्या धार्मिक या सामाजिक सम्मेलनों की आड़ में संवैधानिक मूल्यों को कमजोर किया जा रहा है?

  • क्या वंचित वर्गों के सशक्तिकरण को डर के रूप में पेश करना सही है?

  • क्या शिक्षा और युवाओं से जुड़े फैसलों में पर्याप्त संवाद हुआ?

  • और सबसे अहम—क्या सरकार सामाजिक एकता को लेकर अपनी ज़िम्मेदारी निभा रही है?

लोकतंत्र में असहमति, सवाल और बहस व्यवस्था की ताक़त होते हैं।
लेकिन जब मंचों से दिए गए बयान समाज को बांटने लगें, और नीतियां युवाओं को आशंकित करें, तब सरकार की मंशा और दिशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है

आज ज़रूरत है:

  • संयमित भाषा की

  • संवैधानिक मूल्यों के सम्मान की

  • और ऐसे फैसलों की, जो समाज को जोड़ें—तोड़ें नहीं।

क्योंकि मज़बूत राष्ट्र की नींव डर या विभाजन पर नहीं, विश्वास और समानता पर टिकी होती है।