सोशल मीडिया पर वायरल फर्जी नोटों का सौदा, खुलेआम दिए जा रहे मोबाइल नंबर
सोशल मीडिया पर नकली नोटों की खुलेआम खरीद-फरोख्त का मामला वायरल हो रहा है, जिसमें मोबाइल नंबर तक साझा किए जा रहे हैं। इस गंभीर घटना ने देश की आर्थिक सुरक्षा, जांच एजेंसियों की भूमिका और नोटबंदी के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्षी और सामाजिक हलकों में इसे मोदी सरकार की विफलता बताते हुए CBI-ED की प्राथमिकताओं पर भी तीखी बहस शुरू हो गई है।
सोशल मीडिया पर वायरल फर्जी नोटों का सौदा, खुलेआम दिए जा रहे मोबाइल नंबर
सरकार और जांच एजेंसियों की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
सोशल मीडिया पर इन दिनों एक बेहद गंभीर और चिंताजनक मामला वायरल हो रहा है। वायरल हो रहे कंटेंट में नकली नोटों की खुलेआम खरीद-फरोख्त का दावा किया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि इन पोस्ट्स और वीडियो में बकायदा मोबाइल नंबर तक सार्वजनिक रूप से साझा किए गए हैं, जिन पर संपर्क कर फर्जी नोटों का सौदा करने की बात कही जा रही है।

यह मामला सिर्फ एक साइबर अपराध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ सवाल बन गया है। नकली नोटों का नेटवर्क अगर खुलेआम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय है, तो यह कानून-व्यवस्था और खुफिया तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि नकली नोटों का कारोबार सीधे तौर पर
-
आतंकवाद की फंडिंग
-
संगठित अपराध
-
और देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान
जैसे मामलों से जुड़ा होता है।
इसके बावजूद अगर ऐसे नेटवर्क सोशल मीडिया पर बेखौफ होकर सक्रिय हैं, तो यह प्रशासनिक लापरवाही या एजेंसियों की चूक की ओर इशारा करता है।
सोशल मीडिया पर खुलेआम बिक रहे नकली नोट
मोबाइल नंबर के साथ हो रहा फर्जी नोटों का सौदा
देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा गंभीर खतरा
जांच एजेंसियां आखिर कर क्या रही हैं?
नोटबंदी के दावों पर फिर उठे सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि केंद्र सरकार और केंद्रीय जांच एजेंसियां इस पूरे मामले पर क्या कर रही हैं?
सोशल मीडिया पर सक्रिय इन नेटवर्क्स पर न तो त्वरित कार्रवाई की जानकारी सामने आई है, और न ही कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण।
राजनीतिक और सामाजिक हलकों में यह सवाल भी उठ रहा है कि:
-
क्या CBI और ED जैसी एजेंसियां केवल विपक्षी नेताओं के खिलाफ मामलों तक सीमित रह गई हैं?
-
क्या देश की आर्थिक सुरक्षा से जुड़े मामलों पर उनकी सक्रियता कमजोर पड़ गई है?
-

गौरतलब है कि नोटबंदी के समय केंद्र सरकार ने दावा किया था कि इससे नकली नोटों का कारोबार पूरी तरह खत्म हो जाएगा। उस वक्त इसे देशहित में एक बड़ा और साहसिक फैसला बताया गया था। लेकिन मौजूदा हालात इन दावों के बिल्कुल उलट तस्वीर पेश करते नजर आ रहे हैं।
अगर सोशल मीडिया पर नकली नोटों की खरीद-फरोख्त हो रही है, तो यह नोटबंदी की प्रभावशीलता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
सरकार की चुप्पी पर सवाल
अब तक:
-
न गृह मंत्रालय की ओर से कोई बयान आया है
-
न RBI या जांच एजेंसियों की तरफ से कोई स्पष्ट कार्रवाई सामने आई है
इस चुप्पी को लेकर विपक्ष और आम लोग दोनों ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों को विफल बता रहे हैं। उनका कहना है कि यह मामला सिर्फ कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि नीति और प्रशासनिक असफलता का प्रमाण है।
सोशल मीडिया पर वायरल नकली नोटों का यह मामला एक खतरे की घंटी है।
अगर समय रहते:
-
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय नहीं की गई
-
जांच एजेंसियां सक्रिय नहीं हुईं
-
और दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई
तो यह नेटवर्क और मजबूत हो सकता है, जिसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ेगा।
अब सवाल यही है—
क्या सरकार इस खतरे को गंभीरता से लेगी, या यह मामला भी सिर्फ सोशल मीडिया की सुर्खियों तक सीमित रह जाएगा?
नोट - ख़बर सोशल मीडिया पर वायरल है pk times इसकी पुष्टि नही करता है
Hindu Solanki 
