नरेश को रिहा कराने के लिए गुंजल ने तैयार किया 'चक्रव्यूह'? बयान के पीछे छिपे सियासी संकेत समझिए
नरेश मीणा की रिहाई को लेकर प्रहलाद गुंजल के बयान से राजस्थान की सियासत में नई चर्चा शुरू हो गई है। जानें गुंजल के बयान और इसके पीछे की राजनीतिक संभावनाएं।
नरेश मीणा की रिहाई को लेकर प्रहलाद गुंजल के नए बयान ने राजस्थान की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। लंबे समय बाद गुंजल ने जेल में बंद आदिवासी नेताओं की रिहाई का मुद्दा उठाया है। सवाल है। क्या यह सिर्फ एक बयान है या नरेश मीणा के समर्थन में किसी बड़ी राजनीतिक रणनीति की शुरुआत?
राजस्थान की राजनीति में प्रहलाद गुंजल के एक बयान ने नई सियासी अटकलों को जन्म दे दिया है। विश्व आदिवासी दिवस पर गुंजल ने जेल में बंद आदिवासी नेताओं की रिहाई की बात उठाते हुए सरकार से उनके लिए रास्ता निकालने की अपील की। इस बयान को नरेश मीणा के मामले से जोड़कर देखा जा रहा है।
गुंजल ने कहा कि 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे मौकों पर सरकारें कई सजायाफ्ता कैदियों की रिहाई करती हैं। ऐसे में जेल में बंद आदिवासी नेताओं के मामले में भी सरकार को संवेदनशीलता दिखाते हुए कोई रास्ता निकालना चाहिए। उन्होंने राजनीतिक लड़ाई के कारण जेल पहुंचने वाले नेताओं का मुद्दा भी उठाया।
बयान से ज्यादा उसकी टाइमिंग की चर्चा
गुंजल का बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि नरेश मीणा के मुद्दे पर पिछले कुछ समय से उनकी सार्वजनिक सक्रियता कम दिखाई दे रही थी। इससे पहले नरेश मीणा की रिहाई की मांग के दौरान गुंजल सक्रिय भूमिका में नजर आए थे। ऐसे में लंबे अंतराल के बाद फिर से इस मुद्दे पर उनकी आवाज सुनाई देना कई राजनीतिक सवाल खड़े करता है। सबसे बड़ा सवाल यही है क्या गुंजल नरेश मीणा के समर्थन में दोबारा सक्रिय होने की तैयारी कर रहे हैं?
कांग्रेस के घटनाक्रम से भी जुड़ रही कहानी
हाल के दिनों में प्रहलाद गुंजल से जुड़े कुछ घटनाक्रम भी चर्चा में रहे हैं। कोटा में एक कार्यक्रम के दौरान अशोक चांदना के बोलने के समय गुंजल के मंच से चले जाने की घटना ने भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी। हालांकि इन घटनाओं से किसी राजनीतिक फैसले का सीधा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसी पृष्ठभूमि में नरेश मीणा को लेकर आया गुंजल का बयान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर हो जाता है।
क्या नरेश मीणा बनेंगे गुंजल की नई सियासी लड़ाई का केंद्र?
प्रहलाद गुंजल की राजनीति की पहचान आक्रामक तेवर और सड़क पर उतरकर मुद्दे उठाने वाले नेता की रही है। दूसरी ओर नरेश मीणा की रिहाई का मुद्दा उनके समर्थकों के बीच लगातार भावनात्मक और राजनीतिक महत्व रखता है। ऐसे में यदि आने वाले दिनों में गुंजल इस मुद्दे पर अपनी सक्रियता बढ़ाते हैं तो नरेश मीणा के समर्थन में चल रही आवाज को नया राजनीतिक बल मिल सकता है। इसके मायने आने वाले पंचायत चुनावों के लिहाज से भी निकाले जाएंगे।
क्या बन रहा है 'चक्रव्यूह'?
फिलहाल प्रहलाद गुंजल ने नरेश मीणा की रिहाई के लिए किसी आंदोलन, प्रदर्शन या अभियान की घोषणा नहीं की है। इसलिए किसी 'चक्रव्यूह' के तैयार होने की बात को अभी राजनीतिक संभावना और संकेत के तौर पर ही देखा जा सकता है। लेकिन यदि आने वाले दिनों में गुंजल अपने समर्थकों को सक्रिय करते हैं, नरेश मीणा के पक्ष में बैठकें शुरू होती हैं या रिहाई की मांग को लेकर कोई बड़ा कार्यक्रम सामने आता है, तो यह बयान उस अभियान की शुरुआती भूमिका साबित हो सकता है। यानी कहानी अभी बयान तक पहुंची है, आंदोलन तक नहीं। अब नजर प्रहलाद गुंजल के अगले कदम पर है। क्या यह आदिवासी दिवस पर दिया गया एक बयान भर था या नरेश मीणा की रिहाई को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की पहली चाल? राजस्थान की राजनीति में इसका जवाब गुंल का अगला कदम देगा।

