ब्रेक फेल नहीं, नीयत फेल है, राजस्थान की सड़कों पर मौत का राज़
साल 2025 राजस्थान के लिए सड़क हादसों के लिहाज़ से अब तक का सबसे दर्दनाक साल साबित हो रहा है। बीते कुछ महीनों में एक के बाद एक भयावह घटनाएँ सामने आई हैं। जयपुर के भांकरोटा में टैंकर फटने से कई लोगों की जान चली गई
जयपुर। साल 2025 राजस्थान के लिए सड़क हादसों के लिहाज़ से अब तक का सबसे दर्दनाक साल साबित हो रहा है। बीते कुछ महीनों में एक के बाद एक भयावह घटनाएँ सामने आई हैं। जयपुर के भांकरोटा में टैंकर फटने से कई लोगों की जान चली गई, जैसलमेर हादसे ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया और अब फलोदी के पास हुई भीषण बस दुर्घटना ने फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर राजस्थान की सड़कों पर सुरक्षा नाम की चीज़ बची भी है या नहीं। हर हादसे के बाद जांच बैठती है, बयान दिए जाते हैं, लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं।
अक्सर हादसे के बाद एक ही पंक्ति सुनने को मिलती है — “बस की ब्रेक फेल हो गई थी।” मगर सच्चाई इससे कहीं गहरी है। जब परिवहन विभाग और ड्राइवर यूनियनों से बात की गई तो सामने आया कि इन हादसों की जड़ में सिर्फ मशीन नहीं, बल्कि इंसान की थकावट, तनाव और सरकारी उपेक्षा भी है।

राजस्थान में ज़्यादातर बस और ट्रक ड्राइवर 18 से 20 घंटे तक लगातार गाड़ी चलाने को मजबूर हैं। न उनके पास आराम का समय होता है, न रुकने की व्यवस्था। कई बार ड्राइवर बताते हैं कि नींद आँखों में होती है लेकिन सवारी या माल समय पर पहुँचाना होता है, नहीं तो मालिक पैसे काट लेता है। औसतन 12 से 15 हजार रुपये की कमाई में वे अपने परिवार को चलाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कई बार महीनों तक उन्हें वेतन भी नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में मानसिक दबाव और गुस्सा दोनों बढ़ते हैं, और वही सड़क पर हादसों का कारण बन जाते हैं।
बसों की फिटनेस चेक सिर्फ कागज़ों पर होती है। ओवरलोडिंग, खराब सड़कें और पुराने वाहन इन मौतों की जड़ों में हैं। वहीं दूसरी तरफ, ड्राइवरों के लिए न तो किसी होटल या ढाबे पर नहाने की सुविधा है, न आराम करने की। कई ड्राइवर 8-10 दिन तक बिना नहाए सिर्फ ट्रिप पूरी करने में लगे रहते हैं ताकि थोड़े ज्यादा पैसे कमा सकें और परिवार का पेट भर सके।
अगर हम विकसित देशों की बात करें, तो अंतर साफ नज़र आता है। अमेरिका और कनाडा में एक ड्राइवर को एक दिन में अधिकतम 9 घंटे तक ही गाड़ी चलाने की अनुमति होती है। हर 4 घंटे बाद 30 मिनट का ब्रेक अनिवार्य है। वहाँ सरकार ने हर हाईवे पर “ड्राइवर रेस्ट ज़ोन” बनाए हैं, जहाँ मुफ्त वॉशरूम, नहाने की सुविधा और आराम के कमरे होते हैं। वहीं ड्राइवरों की सैलरी भी 3000 से 4000 डॉलर प्रतिमाह तक होती है और मानसिक स्वास्थ्य जांच नियमित रूप से होती है।
इसके मुकाबले राजस्थान में ड्राइवरों की स्थिति दयनीय है। न कोई मेडिकल जांच होती है, न सुरक्षा की परवाह। मालिकों के दबाव में ड्राइवर ओवरस्पीडिंग और ओवरलोडिंग करने को मजबूर होते हैं। यह स्थिति सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि हर यात्री के जीवन के लिए खतरा है।
एक ड्राइवर ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा, “हम भी इंसान हैं, लेकिन सिस्टम हमें मशीन समझता है। अगर एक ट्रिप में देर हो जाए तो मालिक फोन पर गालियाँ देता है। कभी-कभी 10 दिन तक नहाने का वक्त नहीं मिलता।” उनकी ये बातें सिर्फ दर्द नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना हैं जिसने इंसान को मशीन में बदल दिया है।
अब सवाल सरकार से है — आखिर कब तक ड्राइवरों के लिए ड्राइविंग टाइमिंग तय नहीं की जाएगी? कब तक हर 200 किलोमीटर पर ड्राइवरों के लिए आराम केंद्र नहीं बनाए जाएँगे? कब तक बस फिटनेस रिपोर्ट सिर्फ एक कागज़ी औपचारिकता बनी रहेगी? और कब तक परिवहन विभाग सिर्फ वसूली का केंद्र बना रहेगा?
समाधान मुश्किल नहीं हैं, बस नीयत की ज़रूरत है। सरकार चाहे तो ड्राइविंग ऑवर्स की कानूनी सीमा तय कर सकती है, हर 150 किलोमीटर पर “ड्राइवर रेस्ट प्वाइंट” बना सकती है, और ड्राइवरों के लिए बीमा व मानसिक स्वास्थ्य जांच अनिवार्य कर सकती है। बस मालिकों पर सख्त निगरानी और वेतन की ट्रैकिंग से भी बड़ा फर्क पड़ सकता है।
आज ज़रूरत है कि ड्राइवरों को “मशीन नहीं, इंसान” समझा जाए। जब तक सरकार और समाज मिलकर इस दिशा में कदम नहीं उठाते, तब तक राजस्थान की सड़कें विकास की नहीं, बल्कि मौत की पटरी बनी रहेंगी। हर नए हादसे के बाद हम बस यही सुनते रहेंगे — “एक और बस दुर्घटना, कई लोग मारे गए…”

