खेती या धीमा ज़हर? गुजरात के राज्यपाल के बयान ने छेड़ी नई बहस

गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देते हुए रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग पर चिंता जताई है। जानिए प्राकृतिक खेती, मिट्टी की सेहत, किसानों की आय और युवाओं के लिए खेती के नए अवसरों पर पूरी रिपोर्ट।

खेती या धीमा ज़हर? गुजरात के राज्यपाल के बयान ने छेड़ी नई बहस
Acharya devvrat

क्या आज हमारी थाली में परोसा जा रहा भोजन हमें पोषण दे रहा है या धीरे-धीरे बीमार बना रहा है? यह सवाल हाल ही में गुजरात के राज्यपाल Acharya Devvrat के एक बयान के बाद चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देते हुए कहा कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी की सेहत और लोगों के स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुंचाया है।

हरित क्रांति से आत्मनिर्भरता, लेकिन बढ़ी रसायनों पर निर्भरता

1960 के दशक में हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनाया। यूरिया और डीएपी जैसे उर्वरकों ने उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि समय के साथ इन रसायनों का अत्यधिक उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता पर असर डालने लगा।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, लगातार रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल से मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीव, केंचुए और लाभकारी बैक्टीरिया कम होते गए, जिससे भूमि की उर्वरता प्रभावित हुई है।

प्राकृतिक खेती को समाधान मानते हैं राज्यपाल

आचार्य देवव्रत लंबे समय से प्राकृतिक खेती के समर्थक रहे हैं। उनका कहना है कि खेती को रसायनों पर निर्भर बनाने के बजाय प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर विकसित किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, प्राकृतिक खेती मिट्टी की सेहत सुधारने के साथ-साथ उत्पादन लागत भी कम कर सकती है।

प्राकृतिक खेती के मॉडल में देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से तैयार “जीवामृत” जैसे जैविक घोल का उपयोग किया जाता है, जो मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की सक्रियता बढ़ाने का दावा करता है।

क्या प्राकृतिक खेती से बढ़ सकती है किसानों की आय?

प्राकृतिक खेती के समर्थकों का कहना है कि इससे किसानों की लागत घटती है और रसायन मुक्त उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण बेहतर मूल्य भी मिल सकता है। वहीं आलोचकों का तर्क है कि बड़े पैमाने पर इसकी सफलता और उत्पादन क्षमता को लेकर अभी और अध्ययन की आवश्यकता है।

खेती को लेकर बदल रही है सोच

पूर्व केंद्रीय मंत्री Kailash Choudhary ने भी हाल ही में कहा कि भविष्य में खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सम्मानजनक और लाभकारी करियर विकल्प बन सकती है। उनका मानना है कि यदि खेती तकनीक, नवाचार और प्राकृतिक पद्धतियों से जुड़ती है तो युवा पीढ़ी का रुझान इस क्षेत्र की ओर बढ़ेगा।

क्या खेती बनेगी युवाओं की पहली पसंद?

देश में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहां युवा पेशेवर कॉर्पोरेट नौकरियां छोड़कर ऑर्गेनिक और प्राकृतिक खेती की ओर बढ़े हैं। बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता और रसायन मुक्त खाद्य पदार्थों की मांग ने इस क्षेत्र में नए अवसर पैदा किए हैं।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या आने वाले वर्षों में भारतीय युवा खेती को अपने पहले करियर विकल्प के रूप में चुनेंगे? और क्या सरकार को प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए अधिक प्रोत्साहन और सब्सिडी देनी चाहिए?

यह बहस केवल खेती की नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा, मिट्टी की सेहत और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी जुड़ी हुई है।