2028 से पहले राजे को मनाने के लिए आलाकमान ने टेके घुटने? नई BJP टीम में छिपा राजस्थान का बड़ा संदेश

भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद पर बरकरार रखा गया है। राजे 2019 से पार्टी में इस जिम्मेदारी से जुड़ी रही हैं।

2028 से पहले राजे को मनाने के लिए आलाकमान ने टेके घुटने? नई BJP टीम में छिपा राजस्थान का बड़ा संदेश
Vasundhara Raje

भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम का ऐलान हो गया है और राजस्थान की राजनीति के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण नाम एक बार फिर वसुंधरा राजे का है। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद पर बरकरार रखा गया है। राजे 2019 से पार्टी में इस जिम्मेदारी से जुड़ी रही हैं। यानी इसे नई नियुक्ति के बजाय उनके राजनीतिक और संगठनात्मक महत्व को बरकरार रखने के फैसले के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा। लेकिन राजस्थान में 2023 के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों के कारण इसका अर्थ सिर्फ एक संगठनात्मक पद तक सीमित नहीं रह जाता।

सवाल है क्या 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा हाईकमान राजस्थान की सबसे प्रभावशाली वरिष्ठ नेताओं में से एक वसुंधरा राजे को पूरी तरह साथ रखने की रणनीति पर काम कर रहा है?

2023 की 'पर्ची' से बदली थी राजस्थान भाजपा

12 दिसंबर 2023 को भाजपा विधायक दल की बैठक में भजनलाल शर्मा को राजस्थान का मुख्यमंत्री चुना गया। वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री पद की प्रमुख दावेदारों में गिनी जा रही थीं, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने नई पीढ़ी के चेहरे भजनलाल शर्मा पर भरोसा जताया। इसके बाद राजस्थान भाजपा का शक्ति-संतुलन बदल गया। राजे सत्ता के मुख्य केंद्र से बाहर हुईं, जबकि भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में नई सरकार और नई राजनीतिक व्यवस्था तैयार हुई।

राजे के बयानों ने क्यों खींचा ध्यान? 

2024 में वसुंधरा राजे के कई भाषण राजनीतिक चर्चा का विषय बने। 3 अगस्त को उन्होंने “पद, कद और मद” की बात करते हुए कहा कि पद और मद स्थायी नहीं होते, लेकिन काम से बना कद स्थायी रहता है। इसके बाद उदयपुर में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने “जीओ और जीने दो” के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए राजनीतिक अर्थ निकाले जाने वाला संदेश दिया। फिर 3 सितंबर 2024 को उनका चर्चित “पीतल की लौंग” वाला बयान सामने आया। राजे ने किसी नेता का नाम नहीं लिया था, इसलिए इन टिप्पणियों को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा या केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ सीधा हमला कहना सही नहीं होगा। इसके बावजूद इन बयानों को राजस्थान में राजे की बदली भूमिका और उनके राजनीतिक संदेशों से जोड़कर देखा गया।

लोकसभा चुनाव ने भी बढ़ाए सवाल

2024 के लोकसभा चुनाव में राजस्थान की 25 सीटों में भाजपा 14 जीत सकी। 2019 में राज्य की सभी 25 सीटों पर एनडीए का कब्जा था, इसलिए 2024 का परिणाम भाजपा के लिए झटका माना गया। इसी दौरान वसुंधरा राजे का चुनाव प्रचार मुख्य रूप से झालावाड़-बारां सीट और अपने बेटे दुष्यंत सिंह के चुनाव क्षेत्र के आसपास केंद्रित दिखाई दिया। इसके बाद राजनीतिक हलकों में सवाल उठा कि क्या राजस्थान में भाजपा को अपने पुराने और प्रभावशाली नेताओं को ज्यादा सक्रिय भूमिका देने की जरूरत है। 

2026 में राजे को बरकरार रखने का क्या अर्थ ?

नितिन नवीन की नई भाजपा टीम में कई बदलाव हुए हैं। स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। बी.एल. संतोष संगठन महामंत्री बने हुए हैं और पार्टी की आईटी विंग में भी बदलाव किया गया है। इसके बावजूद वसुंधरा राजे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी पर कायम हैं। यही फैसला राजस्थान के संदर्भ में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

पार्टी के पास संगठनात्मक बदलाव के दौरान राजे को नई भूमिका देने या राष्ट्रीय पद से बाहर करने का विकल्प था, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने मौजूदा स्थिति बनाए रखी। इसे इस संकेत के रूप में पढ़ा जा सकता है कि भाजपा अभी भी राजे के अनुभव और राजनीतिक प्रभाव को उपयोगी मानती है।

क्या 2028 है असली वजह?

राजस्थान विधानसभा का अगला नियमित चुनाव 2028 में होना है। भाजपा के सामने तब सिर्फ कांग्रेस से मुकाबला नहीं होगा। उसे अपने भीतर के सभी बड़े शक्ति केंद्रों को भी एक साथ लेकर चलना होगा।

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व के साथ ही राजस्थान भाजपा में कई अनुभवी नेता मौजूद हैं और उनमें वसुंधरा राजे सबसे बड़े नामों में से एक हैं। दो बार मुख्यमंत्री रह चुकीं राजे का अपना राजनीतिक नेटवर्क और समर्थक आधार है। इसीलिए 2028 की तैयारी में उन्हें पूरी तरह किनारे करना भाजपा के लिए राजनीतिक जोखिम साबित हो सकता है।

2012 में भी दिख चुकी है राजे की ताकत

वसुंधरा राजे के राजनीतिक करियर में 2012 का घटनाक्रम इसका बड़ा उदाहरण है। उस समय राजस्थान भाजपा में नेतृत्व को लेकर खींचतान हुई थी। वरिष्ठ नेता गुलाबचंद कटारिया की प्रस्तावित यात्रा को लेकर विवाद बढ़ा और राजे समर्थक विधायकों तथा नेताओं ने खुलकर दबाव बनाया। आखिरकार पार्टी नेतृत्व को समझौता करना पड़ा। इसके बाद 2013 का चुनाव राजे के नेतृत्व में लड़ा गया और भाजपा ने बड़ी जीत हासिल की। हालांकि मौजूदा परिस्थितियां 2012 से काफी अलग हैं। आज ना कोई खुली बगावत है और ना ही विधायकों के इस्तीफों जैसी स्थिति। लेकिन इतिहास यह जरूर बताता है कि राजस्थान भाजपा में राजे की ताकत को केंद्रीय नेतृत्व पहले भी गंभीरता से लेता रहा है।

आलाकमान झुका या समीकरण समझ गया?

इसीलिए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद पर राजे को बनाए रखने को सीधे “आलाकमान के घुटने टेकने” के रूप में स्थापित करना सही नहीं होगा। लेकिन राजनीतिक सवाल जरूर उठता है अगर भाजपा राजस्थान में पूरी तरह नई पीढ़ी के नेतृत्व की तरफ बढ़ चुकी है, तो वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय नेतृत्व में बरकरार रखना क्यों जरूरी समझा गया? संभावित जवाब 2028 के चुनावी गणित में छिपा हो सकता है। पार्टी शायद ऐसा राजस्थान चाहती है जहां भजनलाल शर्मा की सरकार, प्रदेश संगठन और वसुंधरा राजे जैसे वरिष्ठ चेहरे आपस में टकराने के बजाय एक साथ चुनाव मैदान में उतरें।

'राजे युग' खत्म नहीं हुआ?

2023 में मुख्यमंत्री पद पर भजनलाल शर्मा की नियुक्ति के बाद कई बार यह सवाल उठा कि क्या राजस्थान भाजपा में “राजे युग” खत्म हो चुका है। 2026 की राष्ट्रीय टीम कम से कम इतना जरूर बताती है कि भाजपा के संगठनात्मक नक्शे से राजे अभी बाहर नहीं हुई हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी उनके पास नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी बरकरार है। इसीलिए नई नियुक्तियों से राजस्थान के लिए एक राजनीतिक संदेश निकलता है। 

नई भाजपा में भजनलाल शर्मा की अपनी जगह है, लेकिन वसुंधरा राजे की राजनीतिक उपयोगिता भी खत्म नहीं हुई है। और 2028 करीब आने के साथ यह संतुलन और महत्वपूर्ण होता जाएगा। इसलिए असली सवाल शायद यह नहीं कि भाजपा हाईकमान राजे के आगे झुक गया है। असली सवाल है। 

क्या दिल्ली ने समय रहते यह समझ लिया है कि 2028 में राजस्थान जीतना है तो वसुंधरा राजे को साथ रखना ही होगा?