iPhone में अब डेटा परमिशन का तरीका बदलेगा! Apple को जर्मनी में मिली बड़ी चुनौती, यूजर्स पर पड़ेगा सीधा असर

जर्मनी के Federal Cartel Office की जांच के बाद Apple ने App Tracking Transparency सिस्टम में बदलाव करने पर सहमति जताई है। यूरोप में iPhone यूजर्स को ट्रैकिंग परमिशन पॉप-अप में बदलाव दिख सकता है।

iPhone में अब डेटा परमिशन का तरीका बदलेगा! Apple को जर्मनी में मिली बड़ी चुनौती, यूजर्स पर पड़ेगा सीधा असर

अगर आप iPhone इस्तेमाल करते हैं तो ऐप डाउनलोड या इस्तेमाल करते समय दिखने वाला ‘Allow’ या ‘Ask App Not to Track’ वाला विकल्प आपके लिए नया नहीं होगा। Apple का App Tracking Transparency यानी ATT सिस्टम यूजर्स को यह तय करने की सुविधा देता है कि कोई ऐप उनकी गतिविधियों को दूसरी ऐप्स और वेबसाइट्स पर ट्रैक कर सकता है या नहीं।

अब इसी व्यवस्था को लेकर Apple को जर्मनी में बड़ा झटका लगा है। जर्मनी की प्रतिस्पर्धा नियामक संस्था Federal Cartel Office (FCO) ने Apple के ATT सिस्टम की लंबी जांच पूरी कर ली है। जांच के बाद नियामक ने माना कि Apple के अपने ऐप्स और थर्ड-पार्टी ऐप्स के लिए डेटा परमिशन मांगने की प्रक्रिया में समान व्यवहार नहीं हो रहा था।

Apple ने अब इस व्यवस्था में बदलाव करने पर सहमति जताई है। इसका असर यूरोप में iPhone यूजर्स को दिखाई देने वाले ट्रैकिंग परमिशन पॉप-अप पर पड़ सकता है।

क्या है Apple का App Tracking Transparency सिस्टम?

Apple ने App Tracking Transparency सिस्टम यूजर्स को उनके डेटा पर ज्यादा नियंत्रण देने के उद्देश्य से शुरू किया था। जब कोई ऐप दूसरी कंपनियों की ऐप्स या वेबसाइट्स पर यूजर की गतिविधियों को ट्रैक करना चाहता है, तो उसे पहले अनुमति मांगनी होती है।

मसलन, Facebook या Instagram जैसी ऐप्स अगर यूजर की गतिविधियों से जुड़े डेटा का इस्तेमाल विज्ञापन को ज्यादा लक्षित बनाने के लिए करना चाहती हैं, तो iPhone पर ट्रैकिंग परमिशन का विकल्प सामने आ सकता है।

यूजर अपनी इच्छा के मुताबिक अनुमति दे सकता है या ट्रैकिंग से इनकार कर सकता है।

जर्मनी में Apple पर सवाल क्यों उठे?

FCO की जांच का मुख्य मुद्दा यह था कि Apple की डेटा परमिशन व्यवस्था सभी ऐप डेवलपर्स के लिए समान तरीके से काम कर रही थी या नहीं।

जर्मन नियामक के मुताबिक थर्ड-पार्टी ऐप्स को ट्रैकिंग की अनुमति मांगने के दौरान जिस तरह का पॉप-अप दिखाई देता था, उसकी भाषा और प्रस्तुति यूजर को डेटा शेयर करने से इनकार करने की दिशा में प्रभावित कर सकती थी।

वहीं Apple के अपने ऐप्स के मामले में सहमति लेने की प्रक्रिया अलग और अपेक्षाकृत अनुकूल बताई गई।

यही अंतर प्रतिस्पर्धा के नजरिए से विवाद का कारण बना। नियामक का सवाल था कि अगर Apple अपने प्लेटफॉर्म पर दूसरी कंपनियों के लिए डेटा इस्तेमाल को लेकर सख्त नियम लागू करता है, तो क्या उसके अपने ऐप्स पर भी वही मानक लागू होने चाहिए?

अब iPhone यूजर्स को क्या बदलाव दिखेगा?

Apple ने FCO के सामने अपने ATT सिस्टम में बदलाव करने की प्रतिबद्धता जताई है। इसके तहत थर्ड-पार्टी ऐप्स के लिए दिखाई देने वाले ट्रैकिंग परमिशन पॉप-अप में बदलाव किया जाएगा।

मुख्य तौर पर तीन चीजों पर ध्यान दिया जाएगा:

* परमिशन पॉप-अप की भाषा को ज्यादा निष्पक्ष बनाया जाएगा।

* डिजाइन और विजुअल संकेतों में ऐसे तत्व कम किए जाएंगे जो यूजर को किसी खास विकल्प की ओर धकेलते हों।

* यूजर के सामने अनुमति देने या इनकार करने के विकल्प को ज्यादा संतुलित तरीके से पेश किया जाएगा।

यानी आने वाले समय में iPhone पर ट्रैकिंग परमिशन मांगने वाला पॉप-अप मौजूदा व्यवस्था की तुलना में ज्यादा न्यूट्रल दिखाई दे सकता है।

Apple को मिला चार महीने का समय

FCO के मुताबिक Apple को प्रस्तावित बदलाव लागू करने के लिए चार महीने का समय मिलेगा। इसके बाद इन बदलावों की निगरानी की जाएगी।

Apple की ओर से की गई प्रतिबद्धताएं सात साल तक प्रभावी रहेंगी। इनकी निगरानी के लिए एक स्वतंत्र ट्रस्टी की भूमिका भी तय की जाएगी।

इसका मतलब यह है कि बदलाव सिर्फ कुछ समय के लिए नहीं होंगे, बल्कि लंबे समय तक Apple की डेटा परमिशन व्यवस्था पर नजर रखी जाएगी।

क्या बदलाव सिर्फ जर्मनी तक सीमित रहेगा?

इस फैसले का प्रभाव केवल जर्मनी तक सीमित नहीं रहने वाला है। प्रस्तावित बदलाव यूरोपीय संघ के लगभग सभी देशों में लागू होंगे।

इस वजह से यूरोप में iPhone इस्तेमाल करने वाले बड़ी संख्या में यूजर्स को भविष्य में ATT परमिशन स्क्रीन में बदलाव देखने को मिल सकता है।

भारत समेत यूरोप के बाहर के देशों में इन बदलावों का सीधा असर होगा या नहीं, यह Apple की क्षेत्रीय नीतियों और संबंधित स्थानीय नियमों पर निर्भर करेगा।

 Meta जैसी कंपनियों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

Apple के ATT सिस्टम का असर सिर्फ iPhone यूजर्स तक सीमित नहीं है। डिजिटल विज्ञापन कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए भी यह व्यवस्था काफी महत्वपूर्ण है।

Meta जैसे प्लेटफॉर्म Facebook और Instagram पर विज्ञापन से बड़ी कमाई करते हैं। यूजर की ऑनलाइन गतिविधियों से जुड़े डेटा के आधार पर विज्ञापन कंपनियां लोगों की संभावित रुचियों को समझने और ज्यादा प्रासंगिक विज्ञापन दिखाने की कोशिश करती हैं।

लेकिन जब यूजर ट्रैकिंग की अनुमति नहीं देता, तो इस तरह के डेटा का इस्तेमाल सीमित हो सकता है। इसका असर विज्ञापन की सटीकता और संभावित कमाई पर पड़ सकता है।

यही वजह है कि Apple की ATT नीति लंबे समय से डिजिटल विज्ञापन कंपनियों के लिए विवाद का विषय रही है।

Apple का क्या कहना है?

Apple का रुख है कि ATT सिस्टम का उद्देश्य यूजर्स को अपने डेटा पर स्पष्ट नियंत्रण देना है। कंपनी का कहना है कि मौजूदा सिस्टम यूजर्स को यह समझने में मदद करता है कि कोई ऐप उन्हें ट्रैक करना चाहता है या नहीं।

Apple ने FCO के सामने बदलाव करने पर सहमति जरूर जताई है, लेकिन कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह यूरोप में ATT सिस्टम को जारी रख सकेगी।

कंपनी का तर्क है कि प्रस्तावित बदलावों के बाद भी यूजर्स को अपने डेटा को लेकर नियंत्रण मिलता रहेगा।

 Apple पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल

यूरोप में Apple की ATT व्यवस्था को लेकर इससे पहले भी नियामकीय कार्रवाई हो चुकी है। फ्रांस और इटली में Apple पर भारी जुर्माने लगाए गए हैं।

इन मामलों ने डेटा प्राइवेसी और डिजिटल प्रतिस्पर्धा से जुड़ी एक बड़ी बहस को जन्म दिया है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि Apple यूजर्स को उनके डेटा पर कितना नियंत्रण देता है, बल्कि यह भी है कि क्या Apple अपने ऐप्स और दूसरी कंपनियों के ऐप्स के लिए समान नियम लागू करता है।

यूजर्स के लिए क्या है सबसे अहम बात?

आम iPhone यूजर के लिए इस पूरे मामले का सबसे बड़ा मतलब यह है कि भविष्य में ऐप ट्रैकिंग की अनुमति मांगने वाली स्क्रीन ज्यादा संतुलित हो सकती है।

यूजर को यह तय करने का विकल्प मिलता रहेगा कि वह किसी ऐप को अपनी गतिविधियों को दूसरी ऐप्स और वेबसाइट्स पर ट्रैक करने की अनुमति देना चाहता है या नहीं।

फिलहाल Apple ने बदलाव करने पर सहमति जताई है और इन बदलावों को लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। ऐसे में आने वाले महीनों में iPhone के ATT पॉप-अप का डिजाइन और भाषा बदलती नजर आ सकती है।