अशोक गहलोत ने घेरा, पायलट ने कर दिया क्लीन बोल्ड !
अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच अंदरूनी खींचतान तो हैं ही लेकिन इन दिनों के राजनीतिक घटनाक्रम से ये साफ है कि पायलट ने गहलोत को क्लीन बोल्ड कर दिया।
"कुछ रिश्ते सियासत से बड़े होते हैं,
कुछ जवाब खामोशी में खड़े होते हैं।
जो तंज़ में भी अपनापन तलाश लें,
वो लोग ही असल में बड़े होते हैं...."
राजस्थान कांग्रेस की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से बयान, जवाब, पलट-जवाब और सफाई का एक ऐसा दौर चल रहा है, जिसने पुराने अध्यायों की यादें फिर ताज़ा कर दी हैं। लेकिन दिलचस्प बात ये है कि जहां कुछ लोग अतीत के पन्ने खोलते नज़र आए, वहीं सचिन पायलट ने एक बार फिर भविष्य की राजनीति का संदेश देने की कोशिश की।

कहानी की शुरुआत करते हैं 10 जून से...
करौली में आयोजित कार्यक्रम के मंच से सचिन पायलट ने बिना किसी का नाम लिए ऐसा संदेश दिया, जिसे राजनीतिक गलियारों में काफी गंभीरता से सुना गया। पायलट ने कहा कि "मेरा व्यक्तिगत किसी से कोई झगड़ा नहीं है। मैं बहुत संभलकर बोलता हूं, क्योंकि मुंह से निकली बात कभी वापस नहीं आती। संयम, सम्मान देना और संतोष बेहद जरूरी है। मैंने अपने साथ काम करने वाले सभी नेताओं का सम्मान किया है। हमारे बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद कभी नहीं रहे। हमें मोहब्बत की दुकान खोलनी है।
यानी जब सियासत में तल्ख़ियों की चर्चा हो रही थी, तब सचिन पायलट संयम और सम्मान की बात कर रहे थे। दिलचस्प बात यह रही कि एक तरफ पुराने किस्सों और घटनाओं को याद दिलाने की कोशिशें हो रही थीं, वहीं दूसरी तरफ पायलट ने अपने शब्दों पर नियंत्रण रखते हुए उस राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया जिसकी आज की राजनीति में कमी महसूस होती है। शायद यही वजह है कि विरोधियों से लेकर समर्थकों तक, हर किसी ने उनके इस धैर्य और संतुलित प्रतिक्रिया को नोटिस किया। कई बार जवाब ऊंची आवाज़ में नहीं, बल्कि शांत शब्दों में दिया जाता है और करौली में पायलट का संदेश कुछ ऐसा ही था।
इसी कार्यक्रम में विधायक रमेश मीणा ने भी मंच से अपनी बात रखी। उन्होंने वर्षों पुराने आरोपों का जिक्र करते हुए कहा कि "10 करोड़ लेने का आरोप लगाने वालों से आज भी कहता हूं, मेरा नार्को टेस्ट करा लो, सच सामने आ जाएगा।"
रमेश मीणा ने कृषि विभाग में सामने आ रहे भ्रष्टाचार के मामलों का भी उल्लेख किया और कहा कि किसानों का भरोसा टूटना सबसे बड़ी चिंता है। लेकिन अपने भाषण का सबसे भावुक हिस्सा उन्होंने सचिन पायलट को लेकर रखा। उन्होंने कहा कि पिछले 15 वर्षों से वे एक ऐसे नेता को संघर्ष करते देख रहे हैं जिसने कभी निराशा को अपने चेहरे पर हावी नहीं होने दिया और कभी किसी की बुराई नहीं की। उनके अनुसार यही सचिन पायलट की सबसे बड़ी ताकत है।

अब आते हैं 11 जून पर...
दौसा में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय राजेश पायलट की पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा के बाद जब मीडिया ने सचिन पायलट से सवाल किया, तो उन्होंने ऐसा जवाब दिया जिसने पूरे घटनाक्रम का तापमान अचानक कम कर दिया। पायलट ने कहा कि "अशोक गहलोत जी का बयान मैंने सुना है। जितना अशोक जी का स्नेह और लगाव उनके पुत्र वैभव गहलोत के साथ है, उतना ही स्नेह और लगाव उनका मेरे साथ है….
राजस्थान की राजनीति में यह बयान सिर्फ एक प्रतिक्रिया नहीं था, बल्कि एक संदेश भी था। संदेश यह कि अगर कोई पुरानी बातें याद दिला रहा है, तो जवाब रिश्तों की भाषा में भी दिया जा सकता है। खास बात यह रही कि पायलट चाहते तो उसी अंदाज़ में जवाबी हमला कर सकते थे, लेकिन उन्होंने कटाक्ष की जगह सम्मान का रास्ता चुना। राजनीति में जहां अक्सर शब्द तलवार बन जाते हैं, वहां पायलट ने उन्हें पुल बनाने के लिए इस्तेमाल किया। यही वजह है कि उनका यह बयान केवल राजनीतिक जवाब नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व और धैर्य का परिचय भी माना जा रहा है।
और फिर इसके बाद आया अशोक गहलोत का रिएक्शन...
गहलोत ने सचिन पायलट के बयान का स्वागत करते हुए कहा कि पायलट ने जो कहा, वह बिल्कुल सही है। उन्होंने कहा कि उन्होंने जो भी बातें कहीं, दिल से कहीं। साथ ही यह भी जोड़ा कि कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनने को लेकर पूरे देश में एक धारणा बन गई थी, इसलिए उस विषय पर बात करना जरूरी था। अब उन्हें लगता है कि उनकी बात के बाद वह अध्याय समाप्त हो जाना चाहिए

अशोक गहलोत के सुर कुछ बदले हुए नजर आए। अब गहलोत यह कहते दिखाई दिए कि सचिन पायलट ने जो कहा, दिल से कहा. और मैंने जो कुछ कहा था वो इसलिए कहा क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनने को लेकर बनी धारणाओं को दूर करना जरूरी था। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अब इस अध्याय को समाप्त हो जाना चाहिए। जिस मुद्दे को लेकर पिछले कुछ दिनों से चर्चा गर्म थी, अब उसी पर सफाई भी सामने आने लगी है। पहले तो कुछ बयान सुर्खियां बनते हैं और फिर उनकी मंशा समझाने के लिए स्पष्टीकरण देना पड़ता है। गहलोत के ताजा बयान को भी कई राजनीतिक जानकार उसी नजर से देख रहे हैं।
यानि पहले अध्याय खोला भी गया, फिर उसी अध्याय को बंद करने की घोषणा भी कर दी गई. राजनीति में अक्सर ऐसा होता है कि एक किताब बंद करने के लिए उसके कुछ पन्ने फिर से पढ़े जाते हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जहां पुराने विवादों की चर्चा होती रही, वहीं सचिन पायलट लगातार संयम, सम्मान और रिश्तों की भाषा बोलते दिखाई दिए।
करौली में उन्होंने कहा— "मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं"
दौसा में सचिन पायलट ने ये जता दिया कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद व्यक्तिगत रिश्तों को सम्मान दिया जा सकता है। शायद यही वजह है कि पिछले दो दिनों की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा किसी आरोप या पलटवार की नहीं, बल्कि सचिन पायलट के संयम, धैर्य और उनके शब्दों के चयन की हो रही है। और अब सवाल यही है कि क्या वाकई यह अध्याय बंद हो चुका है. या फिर राजस्थान कांग्रेस की राजनीति में अगला पन्ना खुलने का इंतजार है? फिलहाल इतना तय है कि इस बार बयान कम और उनके पीछे छिपे संदेश ज्यादा पढ़े जा रहे हैं.
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