राजस्थान पंचायत चुनाव: न वोटिंग, न मुकाबला… बीकानेर में 36 कौम ने मिलकर चुन ली गांव की सरकार
बीकानेर की पार्वती तलाई ग्राम पंचायत में सरपंच से लेकर सातों वार्ड पंच तक सभी प्रतिनिधि निर्विरोध चुने गए। 36 कौम की सहमति से बनी गांव की सरकार चर्चा में है।
राजस्थान में पंचायत चुनाव के बीच बीकानेर की एक ग्राम पंचायत ने आपसी सहमति और सामाजिक एकता की मिसाल पेश की है। यहां सरपंच से लेकर वार्ड पंच तक किसी पद के लिए चुनावी मुकाबले की नौबत नहीं आई। पूगल पंचायत समिति की पार्वती तलाई ग्राम पंचायत में ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से अपनी पूरी पंचायत चुन ली। महेंद्र सिंह भाटी निर्विरोध सरपंच निर्वाचित हुए, जबकि सातों वार्डों में वार्ड पंच भी बिना मुकाबले चुने गए।
36 कौम की सहमति से बनी गांव की सरकार
पार्वती तलाई ग्राम पंचायत में ग्रामीणों ने आपसी सहमति से पंचायत प्रतिनिधियों का चयन किया। खास बात यह रही कि गांव के अलग-अलग समाजों के लोगों ने एकजुट होकर इस फैसले का समर्थन किया। ग्रामीणों ने महेंद्र सिंह भाटी के नाम पर सहमति जताई और उन्हें निर्विरोध सरपंच चुना गया।
पूर्व जिला महामंत्री सवाई सिंह तंवर सहित कई ग्रामीणों ने भी इस पहल का समर्थन किया। इसके बाद पंचायत के सातों वार्डों में वार्ड पंचों का चयन भी निर्विरोध हुआ। इस तरह पूरी ग्राम पंचायत का गठन बिना चुनावी मुकाबले के हो गया।
चुनावी टकराव की जगह आपसी सहमति
आमतौर पर पंचायत चुनावों में सरपंच और वार्ड पंच के पदों को लेकर गांवों में मुकाबला देखने को मिलता है। कई जगह चुनावी प्रचार, समर्थन जुटाने और स्थानीय समीकरणों के बीच प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला मतदान से होता है। लेकिन पार्वती तलाई में ग्रामीणों ने अलग रास्ता अपनाया और आपसी सहमति से प्रतिनिधियों का चयन किया।
ग्रामीण इस फैसले को भाईचारे और सामाजिक एकता से जोड़कर देख रहे हैं। उनका मानना है कि सर्वसम्मति से चुनी गई पंचायत गांव के विकास और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कामों को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती है।
अब विकास की जिम्मेदारी निर्विरोध पंचायत पर
पार्वती तलाई में निर्विरोध निर्वाचन के बाद अब ग्रामीणों की उम्मीदें नई पंचायत से जुड़ी हैं। गांव के विकास, बुनियादी सुविधाओं में सुधार और स्थानीय समस्याओं के समाधान की जिम्मेदारी निर्वाचित प्रतिनिधियों पर होगी।
पंचायत चुनाव के बीच पार्वती तलाई की यह पहल बताती है कि स्थानीय स्तर पर आपसी सहमति से भी प्रतिनिधियों का चयन संभव है। हालांकि, इस सहमति को विकास के नतीजों में बदलना अब नई पंचायत की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी।

