इसी सत्र में फिर बढ़ेगी विधायकों की सैलरी? जानिए कहां अटका है मामला

राजस्थान में विधानसभा का मानसून सत्र शुरू हो चुका है और इसके साथ ही एक पुरानी घोषणा फिर चर्चा में है। विधायकों की सैलरी में बढ़ोतरी।

इसी सत्र में फिर बढ़ेगी विधायकों की सैलरी? जानिए कहां अटका है मामला

राजस्थान में विधायकों के वेतन और भत्तों को कर्मचारियों के DA की तर्ज पर समय-समय पर बढ़ाने की मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की घोषणा के करीब छह महीने बाद भी मामला अंतिम फैसले तक नहीं पहुंचा है। संसदीय कार्य विभाग की स्टडी रिपोर्ट और प्रस्ताव CMO भेजे जा चुके हैं, लेकिन जरूरी संशोधन विधेयक अभी तैयार नहीं हुआ है। ऐसे में सवाल है कि क्या मौजूदा विधानसभा सत्र में विधायकों की वेतन वृद्धि का बिल आ पाएगा? राजस्थान में विधानसभा का मानसून सत्र शुरू हो चुका है और इसके साथ ही एक पुरानी घोषणा फिर चर्चा में है। विधायकों की सैलरी में बढ़ोतरी।

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने फरवरी में विधानसभा के भीतर विधायकों के वेतन में सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) की तर्ज पर समय-समय पर बढ़ोतरी की व्यवस्था करने की घोषणा की थी।

इसके बाद विधानसभा से प्रस्ताव संसदीय कार्य विभाग पहुंचा। दूसरे राज्यों में विधायकों को मिलने वाले वेतन-भत्तों की स्टडी हुई। सरकारी खजाने पर पड़ने वाले संभावित वित्तीय भार का आकलन किया गया और रिपोर्ट भी तैयार हो गई।

इसके बावजूद मामला अभी अंतिम मंजिल तक नहीं पहुंचा है। जानकारी के मुताबिक संसदीय कार्य विभाग की ओर से तैयार प्रस्ताव अप्रैल में मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) भेजा गया था और मामला फिलहाल वहीं विचाराधीन है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वेतन वृद्धि लागू करने के लिए जिस कानूनी संशोधन की जरूरत है, उससे संबंधित विधेयक अभी तैयार नहीं हुआ है। ऐसे में मौजूदा सत्र में बिल पेश होगा या विधायकों को आगे इंतजार करना पड़ेगा, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।

फरवरी में CM ने घोषणा की थी?

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने 27 फरवरी 2026 को राजस्थान वित्त एवं विनियोग विधेयक-2026 पर चर्चा का जवाब देते हुए विधायकों के वेतन को लेकर महत्वपूर्ण घोषणा की थी। मुख्यमंत्री ने सदन में कहा था कि विधायकों के वेतन में राज्य कर्मचारियों की तरह समय-समय पर महंगाई भत्ते के अनुसार बढ़ोतरी का प्रावधान प्रस्तावित है और इसे आगामी वित्तीय वर्ष से लागू करने की घोषणा की जा रही है। इस व्यवस्था का मतलब यह होगा कि विधायकों के वेतन में बढ़ोतरी के लिए बार-बार अलग राजनीतिक फैसला लेने के बजाय उसे एक निर्धारित व्यवस्था से जोड़ा जा सकेगा। लेकिन घोषणा को कानूनी रूप देने के लिए मौजूदा कानून में बदलाव जरूरी है। 

घोषणा के बाद कहां अटक गया मामला?

मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की ओर से प्रस्ताव संसदीय कार्य विभाग को भेजा गया। विभाग को दूसरे राज्यों में विधायकों को मिलने वाले वेतन और भत्तों का अध्ययन करने के लिए कहा गया। इसके बाद अधिकारियों ने अलग-अलग राज्यों की व्यवस्था का अध्ययन किया। साथ ही प्रस्तावित बढ़ोतरी से राजस्थान सरकार पर कितना अतिरिक्त वित्तीय भार आएगा, इसके भी विभिन्न पहलुओं का आकलन किया गया। इस अध्ययन के आधार पर संसदीय कार्य विभाग ने प्रस्ताव तैयार कर अप्रैल में मुख्यमंत्री कार्यालय भेज दिया। लेकिन इसके बाद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी है। यानी कहानी अब “रिपोर्ट कब बनेगी?” पर नहीं, बल्कि “CMO फैसला कब करेगा?” पर आकर टिक गई है।

बिल नहीं आया तो क्या होगा?

विधायकों के वेतन, भत्ते और पूर्व विधायकों की पेंशन की व्यवस्था कानून के तहत निर्धारित होती है। इसलिए DA की तर्ज पर भविष्य में स्वतः या समय-समय पर बढ़ोतरी का नया प्रावधान जोड़ना है तो संबंधित कानून में संशोधन करना होगा। इसके लिए विधानसभा में संशोधन विधेयक लाना जरूरी होगा। अगर मौजूदा सत्र में सरकार विधेयक नहीं लाती है तो प्रस्तावित नई व्यवस्था को कानूनी रूप देने की प्रक्रिया आगे खिसक सकती है और विधायकों को वेतन वृद्धि के लिए और इंतजार करना पड़ेगा।

आखिरी बार 2021 में बढ़े थे वेतन-भत्ते

राजस्थान में विधायकों के वेतन और भत्तों में पिछली बड़ी बढ़ोतरी दिसंबर 2021 में तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल में हुई थी। विधायकों और पूर्व विधायकों के वेतन, भत्तों तथा पेंशन से संबंधित व्यवस्था राजस्थान विधानसभा अधिकारियों तथा सदस्यों की परिलब्धियां और पेंशन अधिनियम, 1956 के तहत संचालित होती है। अब प्रस्तावित व्यवस्था में अगर वेतन और संबंधित भुगतान को DA आधारित बढ़ोतरी से जोड़ना है तो इसी कानूनी ढांचे में आवश्यक संशोधन करना होगा।

मंत्री गोदारा बोले- जनता की अपेक्षाएं बढ़ गई 

विधायकों के वेतन में बढ़ोतरी की जरूरत को लेकर खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री सुमित गोदारा ने जनप्रतिनिधियों के बढ़ते सार्वजनिक दायित्वों का हवाला दिया। गोदारा का कहना है कि जनप्रतिनिधियों का काम जनसेवा का है। कार्यकर्ता और आम लोग लगातार उनसे मिलने आते हैं और उनके लिए भी व्यवस्थाएं करनी पड़ती हैं। उनका तर्क है कि पहले जनप्रतिनिधियों की सार्वजनिक कार्यक्रमों में भागीदारी सीमित होती थी, लेकिन अब जनता की अपेक्षाएं और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारियां दोनों बढ़ी हैं।

घोषणा से कानून तक इतना समय क्यों?

वरिष्ठ पत्रकार महेश चंद शर्मा के मुताबिक मुख्यमंत्री स्तर पर होने वाली घोषणाओं को लागू करने में कई बार लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया सामने आती है। विभागों के बीच समन्वय, वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता, कानूनी प्रावधान और नियमों में आवश्यक बदलाव जैसी प्रक्रियाओं के कारण घोषणाओं को धरातल पर आने में समय लग सकता है। विधायकों के वेतन का मामला भी केवल राशि बढ़ाने तक सीमित नहीं है। अगर इसे भविष्य में DA से जोड़ना है तो ऐसी कानूनी व्यवस्था बनानी होगी जो आगे की बढ़ोतरी का आधार भी तय करे।

UCC और ट्री प्रोटेक्शन एक्ट पर भी नजर

मौजूदा विधानसभा सत्र में केवल विधायकों की वेतन वृद्धि ही चर्चा का विषय नहीं है। सरकार की ओर से समान नागरिक संहिता (UCC) और खेजड़ी समेत पेड़ों के संरक्षण से संबंधित प्रस्तावित कानून को लेकर भी राजनीतिक चर्चा बनी हुई है। हालांकि इन विधेयकों को इसी सत्र में पेश या पारित किए जाने को लेकर अंतिम स्थिति सरकार के आधिकारिक विधायी एजेंडे से ही स्पष्ट होगी। चुनावी आचार संहिता के संभावित प्रभाव और आगे एक और सत्र बुलाए जाने जैसी चर्चाएं भी हैं, लेकिन जब तक सरकार या विधानसभा की ओर से औपचारिक कार्यक्रम सामने न आए, नवंबर के आखिर में सदन बुलाकर इन्हें पारित कराने की बात को तय रणनीति के बजाय संभावना के रूप में लिखना ज्यादा उचित होगा।

अब नजर CMO पर

विधायकों की वेतन वृद्धि की पूरी कहानी फिलहाल एक दिलचस्प मोड़ पर है। मुख्यमंत्री घोषणा कर चुके हैं। विधानसभा अध्यक्ष की तरफ से प्रस्ताव भेजा जा चुका है। संसदीय कार्य विभाग दूसरे राज्यों की स्टडी कर चुका है। वित्तीय प्रभाव का आकलन हो चुका है। रिपोर्ट CMO तक पहुंच चुकी है। लेकिन कानूनी बदलाव के लिए जरूरी संशोधन विधेयक अभी सामने नहीं आया है। इसलिए अब सवाल विधायकों की सैलरी बढ़ेगी या नहीं से ज्यादा कब बढ़ेगी और किस फॉर्मूले से बढ़ेगी का है। अगर सरकार मौजूदा सत्र में संशोधन विधेयक लाती है तो फरवरी में हुई घोषणा कानून बनने की दिशा में आगे बढ़ सकती है और अगर बिल नहीं आया तो एक बार फिर सवाल उठेगा। सदन में हुई घोषणा को अमल में आने के लिए आखिर और कितना इंतजार करना होगा?