CJP की School Theek Karo मुहिम: देश के सरकारी स्कूलों की 5 बड़ी समस्याएं, जानिए कहां-कहां है सुधार की जरूरत

CJP की ‘School Theek Karo’ मुहिम के बीच जानिए सरकारी स्कूलों की 5 बड़ी चुनौतियां—जर्जर भवन, साफ पानी-शौचालय की कमी, शिक्षकों की कमी, मिड-डे मील और डिजिटल संसाधनों की समस्या।

CJP की School Theek Karo मुहिम: देश के सरकारी स्कूलों की 5 बड़ी समस्याएं, जानिए कहां-कहां है सुधार की जरूरत

देश में सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए कई स्तरों पर योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अब भी कई स्कूल बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। कहीं स्कूल की इमारत जर्जर है तो कहीं बच्चों के बैठने के लिए पर्याप्त डेस्क-बेंच नहीं हैं। कई जगहों पर साफ पानी और शौचालय जैसी जरूरी सुविधाएं भी पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में CJP की ‘School Theek Karo’ मुहिम ने सरकारी स्कूलों की व्यवस्थाओं और उनकी जमीनी स्थिति को लेकर बहस को फिर तेज कर दिया है।

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए बेहतर माहौल उपलब्ध कराना केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है। सुरक्षित भवन, स्वच्छ पानी, साफ शौचालय, पर्याप्त शिक्षक, पौष्टिक भोजन और खेल-कूद जैसी सुविधाएं भी शिक्षा का अहम हिस्सा हैं। आइए जानते हैं सरकारी स्कूलों के सामने खड़ी 5 बड़ी चुनौतियां।

1. जर्जर इमारतें और बुनियादी ढांचे की समस्या

कई सरकारी स्कूलों में सबसे बड़ी समस्या स्कूल भवन और उसके बुनियादी ढांचे से जुड़ी है। कुछ स्कूलों में छत से पानी टपकने, दीवारों में दरार आने और लंबे समय से मरम्मत नहीं होने जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं।

कई जगहों पर कक्षाओं में बच्चों की संख्या के हिसाब से पर्याप्त डेस्क और बेंच भी उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में बच्चों को जमीन पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है। लंबे समय तक मरम्मत नहीं होने पर स्कूल भवन की सुरक्षा भी चिंता का विषय बन जाती है।

2. साफ पानी और शौचालय की सुविधा का अभाव

स्कूल में बच्चों के लिए साफ पेयजल और स्वच्छ शौचालय बेहद जरूरी हैं। इसके बावजूद कई स्कूलों में इन सुविधाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं होने की शिकायतें सामने आती हैं।

कहीं पीने के पानी की उचित व्यवस्था नहीं है तो कहीं पानी की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते हैं। वहीं, कुछ स्कूलों में शौचालय तो बने हैं, लेकिन उनमें पानी का कनेक्शन नहीं है या वे नियमित रूप से इस्तेमाल में नहीं आते।

छात्राओं के लिए यह समस्या और गंभीर हो जाती है, क्योंकि साफ और सुरक्षित शौचालय की कमी उनकी पढ़ाई और स्कूल में नियमित उपस्थिति को प्रभावित कर सकती है।

3. शिक्षकों की कमी और गैर-शैक्षणिक काम का दबाव

सरकारी स्कूलों की एक बड़ी चुनौती पर्याप्त शिक्षकों की उपलब्धता भी है। खासकर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में स्वीकृत पदों के मुकाबले शिक्षकों की संख्या कम होने की शिकायतें सामने आती रही हैं।

एक शिक्षक को कई कक्षाओं या विषयों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है। इससे बच्चों को व्यक्तिगत ध्यान देना मुश्किल हो जाता है।

इसके अलावा शिक्षकों को समय-समय पर चुनावी ड्यूटी, जनगणना और दूसरे सरकारी कार्यों में भी लगाया जाता है। ऐसे गैर-शैक्षणिक कामों में व्यस्तता का असर नियमित पढ़ाई पर पड़ सकता है।

4. मिड-डे मील और रसोई की स्वच्छता

सरकारी स्कूलों में मिलने वाला मिड-डे मील बच्चों के लिए सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि पोषण और स्कूल में उनकी उपस्थिति से भी जुड़ा हुआ है। लेकिन भोजन तैयार करने की जगह और रसोई की साफ-सफाई को लेकर कई बार सवाल उठते हैं।

खाना बनाने वाले स्थान पर स्वच्छता, साफ पानी, खाद्य सामग्री का सुरक्षित रखरखाव और खाना परोसने की व्यवस्था ठीक होना जरूरी है। अगर इन मानकों का पालन नहीं होता है तो बच्चों के स्वास्थ्य पर इसका असर पड़ सकता है।

इसलिए मिड-डे मील की गुणवत्ता के साथ-साथ किचन और भोजन तैयार करने की पूरी प्रक्रिया की नियमित निगरानी भी जरूरी है।

5. लाइब्रेरी, लैब, खेल और डिजिटल संसाधनों की कमी

आज की शिक्षा केवल किताब और ब्लैकबोर्ड तक सीमित नहीं है। बच्चों को बेहतर तरीके से सीखने के लिए लाइब्रेरी, साइंस लैब, खेलकूद की सुविधाएं और डिजिटल संसाधन भी जरूरी हैं।

लेकिन कई सरकारी स्कूलों में पर्याप्त पुस्तकें, प्रयोगशाला उपकरण या खेल सामग्री उपलब्ध नहीं होने की शिकायतें सामने आती हैं। डिजिटल शिक्षा के दौर में कंप्यूटर, इंटरनेट और स्मार्ट क्लास जैसी सुविधाओं की कमी भी छात्रों के लिए चुनौती बन सकती है।

खेल के पर्याप्त संसाधन नहीं होने से बच्चों के शारीरिक और सामाजिक विकास पर भी असर पड़ सकता है। वहीं, प्रयोगशाला के अभाव में विज्ञान जैसे विषयों की प्रैक्टिकल समझ विकसित करना मुश्किल हो जाता है।

सिर्फ स्कूल बनाना काफी नहीं, सुविधाओं का रखरखाव भी जरूरी

सरकारी स्कूलों में बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए केवल नए भवन बनाना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि पुराने भवनों की समय पर मरम्मत हो, साफ पानी और शौचालय की सुविधा लगातार उपलब्ध रहे, पर्याप्त शिक्षक हों और बच्चों को पढ़ाई के साथ खेल, प्रयोग और डिजिटल शिक्षा के संसाधन भी मिलें।