PM मोदी की 'फ्री ऑनलाइन कोचिंग' कितनी कारगर? फीस से मिलेगी राहत, लेकिन ये चुनौतियां बन सकती हैं बड़ी दीवार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से देश के युवाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग की घोषणा कर देश के विशाल कोचिंग बाजार के सामने एक नया मॉडल रखने का संकेत दिया है।

PM मोदी की 'फ्री ऑनलाइन कोचिंग' कितनी कारगर? फीस से मिलेगी राहत, लेकिन ये चुनौतियां बन सकती हैं बड़ी दीवार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग नेटवर्क बनाने की घोषणा की है। महंगी कोचिंग से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को राहत मिल सकती है, लेकिन सवाल है कि क्या ऑनलाइन पढ़ाई JEE-NEET जैसी कठिन परीक्षाओं के लिए ऑफलाइन क्लासरूम का विकल्प बन पाएगी? मेंटरशिप, अनुशासन, स्क्रीन टाइम और परिणाम इस योजना की असली परीक्षा होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से देश के युवाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग की घोषणा कर देश के विशाल कोचिंग बाजार के सामने एक नया मॉडल रखने का संकेत दिया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि कोचिंग की लागत गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर आर्थिक बोझ डालती है। सरकार डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और अच्छे शिक्षकों की क्षमता को जोड़कर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग का नेटवर्क तैयार करना चाहती है। अगर यह व्यवस्था बड़े स्तर पर प्रभावी तरीके से लागू होती है तो छोटे शहरों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लाखों विद्यार्थियों के लिए गुणवत्तापूर्ण तैयारी तक पहुंच आसान हो सकती है। लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है। क्या फ्री ऑनलाइन कंटेंट उपलब्ध करा देना ही JEE, NEET, UPSC और दूसरी कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के लिए पर्याप्त होगा?

कोचिंग की फीस खत्म, लेकिन क्या समस्या भी खत्म?

ऑनलाइन एजुकेशन ने पिछले कुछ वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का पूरा मॉडल बदल दिया है। एक समय प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थानों में पढ़ने के लिए विद्यार्थियों को दूसरे शहर जाना पड़ता था। कोचिंग फीस के साथ हॉस्टल, भोजन और दूसरे खर्च परिवार पर बड़ा आर्थिक बोझ डालते थे। ऑनलाइन मॉडल ने इस दूरी को काफी हद तक खत्म किया। अब एक छोटे शहर या गांव में बैठा विद्यार्थी भी बड़े शिक्षक का लेक्चर देख सकता है। सरकार की मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग इसी मॉडल को एक कदम आगे ले जा सकती है—जहां आर्थिक स्थिति तैयारी की राह में कम से कम बाधा बने। लेकिन प्रतियोगी परीक्षा में Access और Success एक ही चीज नहीं हैं। यही इस योजना की सबसे बड़ी चुनौती है। 

फ्री लेक्चर मिल जाएगा, मेंटर कहां से आएगा?

ऑफलाइन कोचिंग की ताकत केवल शिक्षक के लेक्चर में नहीं होती। वहां एक टाइम टेबल होता है। नियमित टेस्ट होते हैं। विद्यार्थी की प्रोग्रेस पर नजर रखी जाती है। डाउट पूछने की व्यवस्था होती है। साथ पढ़ने वाले विद्यार्थियों से प्रतियोगिता का माहौल मिलता है। और सबसे महत्वपूर्ण—कोई यह देखने वाला होता है कि विद्यार्थी वास्तव में पढ़ भी रहा है या नहीं। ऑनलाइन पढ़ाई में यही सबसे बड़ा अंतर पैदा होता है। सरकार अगर केवल रिकॉर्डेड लेक्चर और स्टडी मटेरियल उपलब्ध कराती है तो यह योजना ज्ञान का बड़ा डिजिटल पुस्तकालय तो बन सकती है, लेकिन पूरी कोचिंग व्यवस्था का विकल्प बनना मुश्किल होगा। इसलिए असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि फ्री कोचिंग के साथ मेंटोरिंग, डाउट सॉल्विंग, टेस्ट सीरीज, परफॉर्मेंस एनालिसिस और व्यक्तिगत फीडबैक कितना मजबूत बनाया जाता है।

JEE-NEET में चुनौती और बड़ी

JEE और NEET जैसी परीक्षाओं में लाखों विद्यार्थी सीमित सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। ऐसी परीक्षाओं में सिर्फ सिलेबस पूरा करना पर्याप्त नहीं होता। स्पीड, एक्यूरेसी, प्रश्नों की रणनीति, नियमित टेस्ट और कमजोर टॉपिक की पहचान भी महत्वपूर्ण होती है। यही वजह है कि ऑनलाइन मॉडल की असली परीक्षा कंटेंट की मात्रा से नहीं बल्कि विद्यार्थियों के परिणाम से होगी। कोटा के शिक्षाविद् नीलेश गुप्ता का भी मानना है कि देश में मुफ्त शैक्षणिक सामग्री पहले से उपलब्ध है और ऑनलाइन कोचिंग भी काफी सस्ती हुई है। ऐसे में नई व्यवस्था का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि विद्यार्थियों के वास्तविक परिणाम कितने बेहतर होते हैं।

मोबाइल ही क्लासरूम, मोबाइल ही सबसे बड़ा डिस्ट्रैक्शन

ऑनलाइन शिक्षा का एक विरोधाभास भी है। जिस मोबाइल पर विद्यार्थी पढ़ाई करता है, उसी मोबाइल पर सोशल मीडिया, गेमिंग, शॉर्ट वीडियो और मनोरंजन की पूरी दुनिया मौजूद है। ऑफलाइन क्लास में विद्यार्थी के सामने शिक्षक होता है। ऑनलाइन क्लास में शिक्षक के साथ एक क्लिक की दूरी पर Instagram, YouTube Shorts और गेम भी हैं। इसलिए छोटे विद्यार्थियों और किशोरों के लिए डिजिटल अनुशासन बड़ी चुनौती बन सकता है। अगर सरकार इस नेटवर्क को स्कूल आयु के विद्यार्थियों तक बड़े स्तर पर ले जाती है तो सिर्फ कंटेंट नहीं, बल्कि स्क्रीन टाइम मैनेजमेंट और पैरेंटल मॉनिटरिंग पर भी काम करना होगा।

क्या खत्म होगा कोटा मॉडल?

फ्री ऑनलाइन कोचिंग की घोषणा के बाद एक सवाल स्वाभाविक रूप से कोटा जैसे कोचिंग हब को लेकर भी उठता है। क्या विद्यार्थी घर बैठे मुफ्त में देश के बेहतरीन शिक्षकों से पढ़ पाएंगे तो कोटा जाने की जरूरत कम हो जाएगी? शायद कुछ विद्यार्थियों के लिए जरूर। लेकिन ऑफलाइन कोचिंग का पूरा मॉडल सिर्फ लेक्चर पर नहीं टिका है। कोटा जैसे शहर विद्यार्थियों को एक प्रतियोगी माहौल, टेस्टिंग सिस्टम, शिक्षक से सीधा संपर्क और नियमित निगरानी भी उपलब्ध कराते हैं। कोटा हॉस्टल एसोसिएशन के अध्यक्ष नवीन मित्तल के मुताबिक मौजूदा सत्र में भी करीब 95 हजार विद्यार्थी कोटा पहुंचे हैं, जबकि शहर के कई कोचिंग संस्थान समानांतर रूप से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भी चला रहे हैं। यानी ऑनलाइन और ऑफलाइन फिलहाल एक-दूसरे को पूरी तरह खत्म करने के बजाय साथ-साथ चल रहे हैं।

सरकार के पास पहले से एक मॉडल

मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग का विचार पूरी तरह नया भी नहीं है। केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की एक मौजूदा पहल में पात्र वंचित वर्गों के विद्यार्थियों को ऑनलाइन कोर्स, लाइव और रिकॉर्डेड कक्षाएं, टेस्ट सीरीज, पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र, स्टडी मटेरियल, मेंटरशिप, डाउट सॉल्विंग और काउंसलिंग जैसी सुविधाएं मुफ्त उपलब्ध कराने की व्यवस्था पहले से मौजूद है। अगर नए राष्ट्रीय नेटवर्क में इसी तरह की सुविधाओं को बड़े पैमाने पर जोड़ा जाता है तो मॉडल केवल 'फ्री वीडियो' तक सीमित रहने के बजाय ज्यादा प्रभावी हो सकता है।

अभी कई बड़े सवालों के जवाब बाकी

प्रधानमंत्री की घोषणा बड़ी है, लेकिन इसकी विस्तृत रूपरेखा सामने आना अभी बाकी है। कौन-कौन सी प्रतियोगी परीक्षाएं शामिल होंगी? क्या JEE और NEET भी इसके दायरे में आएंगे? शिक्षकों का चयन कैसे होगा? लाइव क्लास होंगी या रिकॉर्डेड? विद्यार्थियों के लिए टेस्ट और रैंकिंग सिस्टम क्या होगा? मेंटोरिंग कैसे मिलेगी? और सबसे महत्वपूर्ण—इस नेटवर्क के विद्यार्थियों के परिणामों को कैसे मापा जाएगा? इन सवालों के जवाब तय करेंगे कि योजना देश के कोचिंग सिस्टम को वास्तव में बदलती है या सिर्फ मुफ्त शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराने वाला एक और डिजिटल प्लेटफॉर्म बनकर रह जाती है।

असली लड़ाई 'Free vs Paid' की नहीं

प्रधानमंत्री मोदी की घोषणा का सबसे बड़ा फायदा साफ है—अगर अच्छी तैयारी मुफ्त उपलब्ध होती है तो परिवारों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ कम हो सकता है और दूरदराज के विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षकों तक पहुंच मिल सकती है। लेकिन शिक्षा में सबसे महत्वपूर्ण सवाल फीस का नहीं, Outcome का है। एक गरीब विद्यार्थी को वही शिक्षक, वही टेस्टिंग सिस्टम, वही मेंटरशिप और वही तैयारी का स्तर मिलना चाहिए जो महंगी कोचिंग खरीद सकने वाले विद्यार्थी को मिलता है। अगर सरकार यह अंतर खत्म कर पाती है तो मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग भारतीय प्रतियोगी शिक्षा व्यवस्था के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकती है। लेकिन अगर योजना सिर्फ वीडियो लेक्चर तक सीमित रह गई तो डिजिटल क्लासरूम तो बन जाएगा, कोचिंग का पूरा इकोसिस्टम नहीं। इसलिए पीएम मोदी की 'फ्री ऑनलाइन कोचिंग' की असली परीक्षा यह नहीं होगी कि प्लेटफॉर्म पर कितने करोड़ विद्यार्थियों ने रजिस्ट्रेशन किया। असली परीक्षा होगी उनमें से कितनों का भविष्य बदला।