राहुल की रैली, राजस्थान पर भार! 1 लाख का टारगेट गहलोत-पायलट की परीक्षा!
राहुल गांधी की एक नवंबर की ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ महारैली के लिए राजस्थान कांग्रेस को एक लाख लोगों का लक्ष्य मिला है। जानें अशोक गहलोत, गोविंद सिंह डोटासरा, सचिन पायलट समेत पार्टी के दिग्गजों के सामने क्या चुनौती है।
दिल्ली में राहुल गांधी की रैली... नारा होगा ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’… लेकिन इस रैली की सफलता का एक बड़ा हिसाब राजस्थान में भी लिखा जाएगा! क्योंकि कांग्रेस ने राजस्थान को दिया है एक लाख लोगों की भीड़ जुटाने का टारगेट। यानी दिल्ली में मोदी सरकार को चुनौती देने से पहले राजस्थान कांग्रेस को अपने ही संगठन की ताकत साबित करनी होगी। अब सवाल है कि क्या प्रदेश कांग्रेस के तमाम दिग्गज मिलकर एक लाख लोगों का आंकड़ा पार कर पाएंगे, या फिर इस अग्निपरीक्षा में नेताओं के दावों और जमीनी हकीकत का अंतर सामने आएगा?
एक नवंबर को दिल्ली में कांग्रेस की ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ महारैली होगी। इसकी तैयारियों को लेकर जयपुर के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में प्रदेश कांग्रेस के नेताओं की बैठक हुई। बैठक के बाद कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने सरेंडर नहीं करेगी। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा और कहा कि विरोध तब तक जारी रहेगा, जब तक ज्ञानेश कुमार पद से नहीं हटते और देश में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित नहीं होते।
लेकिन इस पूरे सियासी घटनाक्रम में राजस्थान का कनेक्शन सबसे अहम है। कांग्रेस ने प्रदेश को एक लाख लोगों को दिल्ली पहुंचाने का लक्ष्य दिया है। मतलब, केंद्र सरकार के खिलाफ लड़ाई का ऐलान दिल्ली से होगा, लेकिन उस ऐलान के समर्थन में भीड़ जुटाने की बड़ी जिम्मेदारी राजस्थान के कंधों पर है।
अब राजस्थान कांग्रेस के सामने चुनौती केवल बसें भरकर दिल्ली पहुंचाने की नहीं, बल्कि अपनी संगठनात्मक ताकत और नेताओं के बीच तालमेल दिखाने की भी है। क्योंकि एक लाख का आंकड़ा छोटा नहीं है। इसके लिए हर जिले, हर विधानसभा क्षेत्र और हर बड़े नेता को मैदान में उतरना होगा। अब देखना यह है कि टारगेट तय करने वाली कांग्रेस उसे पूरा करने के लिए कितनी ताकत लगाती है।
इस अग्निपरीक्षा में प्रदेश कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं की भूमिका भी अहम होगी। बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट समेत पार्टी के कई नेता मौजूद रहे।
गहलोत के पास लंबा राजनीतिक अनुभव है, डोटासरा पर प्रदेश संगठन की जिम्मेदारी है, रंधावा प्रभारी के तौर पर रणनीति की निगरानी कर रहे हैं, टीकाराम जूली विधानसभा में विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं और सचिन पायलट की अपनी राजनीतिक अपील है। अब इन तमाम नेताओं के सामने मौका है कि वे अपनी-अपनी ताकत को एक साझा लक्ष्य के लिए इस्तेमाल करें।
क्योंकि राजस्थान कांग्रेस में एकजुटता की बात तो होती रही है, लेकिन इस बार परीक्षा भाषणों से नहीं, आंकड़ों से होगी। दिल्ली में मंच से कितनी जोरदार हुंकार भरी जाती है, उससे पहले यह देखना होगा कि राजस्थान में संगठन कितनी मजबूती से खड़ा होता है। आखिर एक लाख लोगों का टारगेट किसी एक नेता की नहीं, पूरी प्रदेश कांग्रेस की अग्निपरीक्षा है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन नेता कितने समर्थक लेकर आएगा, बल्कि यह भी है कि प्रदेश कांग्रेस अपनी सामूहिक ताकत कितनी दिखा पाएगी। क्योंकि राजनीति में टारगेट देना आसान है, उसे पूरा करना मुश्किल। और अगर लक्ष्य पूरा हो गया, तो श्रेय लेने वालों की कमी नहीं होगी; लेकिन अगर आंकड़ा पीछे रह गया, तो जिम्मेदारी किसकी होगी—यह सवाल भी उठेगा।
व्यापारियों की चिंता पर भी केसी वेणुगोपाल ने जवाब दिया। दिल्ली में रैली से कारोबारियों को होने वाली परेशानी के सवाल पर उन्होंने कहा कि ज्यादा लोग आएंगे, तो शॉपिंग भी ज्यादा करेंगे और व्यापारियों को फायदा होगा। यानी जहां कुछ लोग भीड़ से होने वाली परेशानी देख रहे हैं, वहीं कांग्रेस महासचिव उसी भीड़ में कारोबार बढ़ने की संभावना तलाश रहे हैं। अब यह सियासी गणित बाजार में कितना सही बैठता है, इसका जवाब रैली के दिन ही मिलेगा।
वहीं, राहुल गांधी की विदेश यात्राओं पर बीजेपी के सवालों को लेकर वेणुगोपाल ने पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा को राहुल गांधी की विदेश यात्राओं के बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं के बारे में सोचना चाहिए।
फिलहाल, कांग्रेस ने एक नवंबर की रैली के लिए अपना राजनीतिक एजेंडा साफ कर दिया है। केंद्र सरकार के खिलाफ विरोध तेज करना है, चुनाव आयोग के मुद्दे को उठाना है और दिल्ली में बड़ी भीड़ जुटाकर अपनी ताकत दिखानी है। लेकिन राजस्थान कांग्रेस के लिए यह रैली एक अतिरिक्त परीक्षा लेकर आई है—क्या प्रदेश के नेता अपने मतभेदों और अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों से ऊपर उठकर एक लक्ष्य पर काम कर पाएंगे?
क्योंकि दिल्ली की रैली में कांग्रेस का राष्ट्रीय संदेश जरूर गूंजेगा, लेकिन राजस्थान में जुटने वाली भीड़ प्रदेश संगठन की तैयारी का पैमाना बनेगी। अब एक लाख का टारगेट पूरा हुआ, तो प्रदेश कांग्रेस अपनी पीठ थपथपा सकेगी; और अगर आंकड़ा चूक गया, तो सवाल भी यहीं उठेंगे।
फिलहाल, तारीख तय है, टारगेट तय है और जिम्मेदारी भी तय है। अब देखना यह है कि राजस्थान कांग्रेस के दिग्गज इस अग्निपरीक्षा में कितने खरे उतरते हैं। क्योंकि राजनीति में दावा करना अलग बात है और उस दावे को भीड़ में बदलकर दिखाना अलग।

